राजनाथ-कोइजुमी की आज अहम बैठक, चीन की चेतावनी के बीच भारत-जापान रक्षा साझेदारी होगी और मजबूत,ड्रैगन की बढ़ेगी बेचैनी
नई दिल्ली। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जापानी समकक्ष शिंजिरो कोइज़ुमी के बीच आज नई दिल्ली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता होने जा रही है। इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य रणनीतिक विश्वास को गहरा करना, द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को मजबूत करना, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता को बढ़ावा देना और भविष्य के सुरक्षा सहयोग का ठोस रोडमैप तैयार करना है।
भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा देने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी के बीच आज अहम द्विपक्षीय वार्ता होगी। बैठक में दोनों देशों के रक्षा संबंधों को मजबूत करने, रणनीतिक भरोसा बढ़ाने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता को लेकर सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी। चीन की ओर से छोटे और विशिष्ट समूहों को लेकर चेतावनी दिए जाने के कुछ ही सप्ताह बाद हो रही यह बैठक रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, वार्ता में भविष्य के रक्षा सहयोग का रोडमैप तैयार करने के साथ मेक इन इंडिया के तहत रक्षा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में सहयोग पर विशेष जोर रहेगा। दोनों देश रक्षा उत्पादन, तकनीक और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी साझेदारी को और व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। जापानी रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने बुधवार को मुंबई स्थित पश्चिमी नौसेना कमान का दौरा किया। उन्होंने स्वदेशी युद्धपोत आईएनएस चेन्नई का निरीक्षण किया और नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन से मुलाकात की। जापानी प्रतिनिधिमंडल को भारतीय नौसेना की क्षमताओं और समुद्री सुरक्षा से जुड़ी तैयारियों की जानकारी भी दी गई। भारत और जापान की बढ़ती रक्षा साझेदारी पर चीन की नजर बनी हुई है। जुलाई में दोनों देशों के बीच शिखर सम्मेलन के बाद चीन ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाने वाला नहीं होना चाहिए। बीजिंग ने छोटे और विशिष्ट गुट बनाने से बचने की सलाह देते हुए कहा था कि ऐसे समूह क्षेत्रीय विभाजन को बढ़ा सकते हैं। इसके बाद जापानी रक्षा मंत्री का भारत दौरा और राजनाथ सिंह के साथ होने वाली वार्ता को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बदलते सामरिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत और जापान औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं बना रहे हैं, लेकिन रक्षा तकनीक, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्रों में लगातार नजदीक आ रहे हैं। भारत-जापान साझेदारी अब केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। दोनों देश दुर्लभ खनिजों, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने पर भी काम कर रहे हैं। चीन पर रणनीतिक निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश दोनों देशों के लिए प्राथमिकता बनती जा रही है। पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर में स्थिति को लेकर भारत और जापान ने चिंता जताई है। दोनों देश बलपूर्वक या दबाव के जरिए यथास्थिति बदलने के प्रयासों का विरोध करते रहे हैं। ऐसे में समुद्री सुरक्षा और निगरानी में दोनों देशों का सहयोग हिंद-प्रशांत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जापान के पास उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, संचार प्रणाली और जहाज निर्माण की विशेषज्ञता है। दूसरी ओर भारत के पास विशाल रक्षा बाजार, बढ़ती रक्षा उत्पादन क्षमता और हिंद महासागर में महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति है। यही वजह है कि दोनों देशों की साझेदारी रक्षा उत्पादन और समुद्री सुरक्षा में नए अवसर पैदा कर सकती है। भारत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विदेशी तकनीक और निवेश को मेक इन इंडिया से जोड़ना चाहता है। ऐसे में जापान के साथ तकनीकी सहयोग से उन्नत रक्षा प्रणालियों के विकास और उत्पादन को गति मिलने की उम्मीद है। राजनाथ सिंह और कोइजुमी की वार्ता में अब निगाह इस बात पर रहेगी कि दोनों देशों की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी कितनी जल्दी ठोस रक्षा परियोजनाओं, तकनीकी हस्तांतरण और समुद्री सहयोग में बदलती है। चीन की आपत्तियों के बीच भारत-जापान की यह बढ़ती साझेदारी हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन के लिहाज से आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है।