नैनीताल:छात्रा के इंटरनल मार्क्स न जोड़ने के विवादित मामले में कुमाऊं यूनिवर्सिटी ने प्रेस नोट जारी कर खुद खोली अपनी पोल, यूनिवर्सिटी से हुई प्रक्रियागत चूक,विभाग पर फोड़ा ठीकरा!अंक सुधारे,CCTV पर अब भी चुप्पी”
नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा और कुलपति प्रो. (कर्नल) दीवान एस. रावत से जुड़े विवाद में विश्वविद्यालय की ओर से जारी ताजा प्रेस नोट ने कई सवालों के जवाब देने के बजाय कुछ नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विश्वविद्यालय ने छात्रा के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसकी अंकतालिका को “मानवीय आधार” पर संशोधित करने की बात कही है और प्रक्रियागत चूक की जांच के लिए समिति गठित किए जाने का दावा किया है। लेकिन सवाल यह है कि यदि छात्रा के भविष्य की चिंता इतनी गंभीर थी कि अंततः अंकतालिका संशोधित करनी पड़ी, तो वही समाधान पहले क्यों नहीं निकाला गया? क्या विश्वविद्यालय का यह “मानवीय दृष्टिकोण” केवल इसी छात्रा के लिए था या कम अंक, विलंबित असाइनमेंट और प्रक्रियागत चूक से जूझने वाले हर विद्यार्थी को ऐसी ही राहत मिलती है?
विश्वविद्यालय के प्रेस नोट में खुद कहा गया है कि 28 अप्रैल 2023 को सभी विभागों को पोर्टल पर अंक अपलोड करने के लिए तीन दिन का समय दिया गया था। दूसरी ओर, आरटीआई के जवाब में भू-विज्ञान विभाग की ओर से 24 अप्रैल 2023 को छात्रा के अंक विश्वविद्यालय को भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी। यदि विभाग ने 24 अप्रैल को अंक भेज दिए थे और विश्वविद्यालय ने 28 अप्रैल से अंक अपलोड करने के लिए पोर्टल खोला था, तो फिर वे अंक छात्रा की अंकतालिका में क्यों नहीं चढ़े? आखिर गलती कहां हुई—विभाग में, परीक्षा अनुभाग में या पूरी व्यवस्था में?
अब विश्वविद्यालय यह कह रहा है कि 24 अप्रैल 2023 की लॉगबुक प्रविष्टि में अंक भेजे जाने का उल्लेख नहीं है। यानी यूनिवर्सिटी द्वारा अब इस बड़ी चूक का ठीकरा सीधे विभाग पर फोड़ा जा रहा है ,जबकि आरटीआई में विभाग की ओर से अंक भेजे जाने की जानकारी दी गई है। यदि आरटीआई का जवाब गलत था तो क्या उसके लिए किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? और यदि आरटीआई का जवाब सही था तो विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में उसकी पुष्टि क्यों नहीं मिल रही?

बता दें कि आरटीआई में विभाग की ओर से 24 अप्रैल 2023, 15 जुलाई 2023, 5 अप्रैल 2024 और 25 अप्रैल 2026 को अलग-अलग स्तर पर अंक भेजे जाने की जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय इन प्रविष्टियों के प्रमाण और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है। ऐसे में अब किसी प्रेस नोट से ज्यादा जरूरी है कि मूल लॉगबुक, डायरी, परीक्षा अनुभाग की प्राप्ति रजिस्टर, संबंधित पत्रों और डिजिटल रिकॉर्ड को सार्वजनिक अथवा स्वतंत्र जांच के सामने रखा जाए। इससे साफ हो सकता है कि अंक कब तैयार हुए, कब भेजे गए और विश्वविद्यालय तक पहुंचने के बाद उनका क्या हुआ।
विश्वविद्यालय के प्रेस नोट में देर से असाइनमेंट जमा करने के मामले में निर्धारित परीक्षा शुल्क अथवा विलंब शुल्क की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। विश्वविद्यालय का कहना है कि विलंब से असाइनमेंट स्वीकार करने और अंक भेजने के लिए परीक्षा नियंत्रक की अनुमति तथा निर्धारित विलंब शुल्क की प्रक्रिया अपेक्षित थी, जिसका रिकॉर्ड विभाग द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया। लेकिन यहां एक सीधा सवाल विश्वविद्यालय से भी पूछा जाना चाहिए—क्या इस छात्रा ने निर्धारित परीक्षा शुल्क या विलंब शुल्क जमा किया था?
यदि शुल्क जमा किया गया था तो उसकी रसीद, चालान, ऑनलाइन भुगतान का रिकॉर्ड या कोई अन्य प्रमाण सामने क्यों नहीं रखा गया? और यदि शुल्क जमा नहीं किया गया था तो विभाग ने कथित रूप से अंक किस नियम के तहत भेजे? केवल यह कहना कि “निर्धारित शुल्क की प्रक्रिया अपेक्षित थी”, इस सवाल का जवाब नहीं है कि वास्तव में शुल्क जमा हुआ था या नहीं।
विश्वविद्यालय ने यह भी बताया कि 13 जुलाई 2026 को छात्रा कुलपति से मिली और उसके पास अपने दावे के समर्थन में कोई रिकॉर्ड नहीं था। इसके बावजूद कुलपति ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए विभागाध्यक्ष से रिपोर्ट मांगी और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर अंततः छात्रा की अंकतालिका संशोधित कर दी गई। विश्वविद्यालय इसे छात्रहित में लिया गया फैसला बता रहा है।
छात्रा ने 13 जुलाई की मुलाकात को लेकर कुलपति पर अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए हैं। यही वह बिंदु है जिस पर विश्वविद्यालय का प्रेस नोट लगभग खामोश है। यदि छात्रा के आरोप गलत हैं तो फिर उस मुलाकात की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को लेकर स्थिति स्पष्ट करने में परेशानी क्या है? छात्रा लगातार यह चुनौती दे रही है कि यदि उसके आरोप गलत हैं तो कुलपति कार्यालय की सीसीटीवी फुटेज सामने रखी जाए। ऐसे में विश्वविद्यालय के पास अपने पक्ष को सबसे मजबूत तरीके से साबित करने का इससे बेहतर अवसर क्या हो सकता है?
अंकतालिका में अंक बढ़ा देना या संशोधित कर देना यह साबित नहीं करता कि 13 जुलाई को कुलपति कार्यालय में क्या हुआ था। यह दो अलग-अलग सवाल हैं। एक सवाल छात्रा के शैक्षणिक रिकॉर्ड का है और दूसरा कुलपति कार्यालय में कथित अभद्र व्यवहार का। विश्वविद्यालय ने पहले सवाल पर विस्तृत सफाई दी है, लेकिन दूसरे सवाल पर स्पष्ट जवाब का इंतजार अब भी बना हुआ है।
विडंबना यह है कि छात्रा के आरोपों के बाद विश्वविद्यालय में हुई बैठक में कुलपति के समर्थन में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, कर्मचारियों और शिक्षकों के सामने आने की बात कही गई। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि छात्रा के आरोप पूरी तरह निराधार हैं, तो इस विवाद का सबसे सरल रास्ता यही था कि आरोपों से जुड़ी सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की उपलब्धता और स्थिति को पारदर्शी तरीके से सामने रखा जाता। इससे न केवल छात्रा के आरोपों की सच्चाई सामने आती, बल्कि कुलपति पर लगे आरोपों से भी विश्वविद्यालय को निर्णायक रूप से राहत मिल सकती थी।
इसके बजाय बहस अंकतालिका, असाइनमेंट और छात्रा के कथित विलंब पर घूमती रही। सवाल यह है कि क्या अंकतालिका का विवाद सुलझ जाने से कुलपति पर लगाए गए कथित अभद्र व्यवहार के आरोप भी अपने आप समाप्त हो जाते हैं?
विश्वविद्यालय ने अब प्रक्रियागत चूक की जांच के लिए समिति गठित की है। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन जांच की विश्वसनीयता तभी मजबूत होगी जब जांच केवल विभागीय प्रक्रिया तक सीमित न रहकर उन सभी सवालों को देखे जो इस विवाद के केंद्र में हैं। जैसे 24 अप्रैल 2023 को अंक भेजे जाने का दावा, उसके बाद की विभागीय प्रविष्टियां, परीक्षा अनुभाग में उनकी प्राप्ति का रिकॉर्ड, विलंब शुल्क अथवा परीक्षा शुल्क, पोर्टल पर अंक अपलोड करने की प्रक्रिया और अंततः 30 जुलाई 2026 को अंकतालिका संशोधित किए जाने का आधार।
कुलपति के कार्यकाल से पहले की घटनाओं को लेकर विश्वविद्यालय ने यह स्पष्ट किया है कि प्रो. दीवान एस. रावत ने 21 जुलाई 2023 को कार्यभार संभाला था। यदि अंक संबंधी शुरुआती घटनाएं वास्तव में पूर्व प्रशासन के कार्यकाल की हैं तो इसकी जिम्मेदारी भी उसी आधार पर तय होनी चाहिए। लेकिन 13 जुलाई 2026 की घटना तो वर्तमान प्रशासन और वर्तमान कुलपति से सीधे जुड़ी बताई जा रही है। इसलिए उस दिन क्या हुआ, इसका जवाब भी वर्तमान प्रशासन को ही देना होगा।अगर रिकॉर्ड सही हैं तो उन्हें सामने आने दीजिए। अगर छात्रा के आरोप गलत हैं तो सीसीटीवी फुटेज से स्थिति साफ होने दीजिए। अगर विभाग ने गलती की है तो जिम्मेदारी तय कीजिए। अगर छात्रा ने नियमों का उल्लंघन किया था तो परीक्षा शुल्क, विलंब शुल्क और संबंधित अनुमति का रिकॉर्ड सामने रखिए। क्योंकि “मानवीय दृष्टिकोण” से अंकतालिका संशोधित करना एक प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन इससे उन सवालों का जवाब नहीं मिलता जो दस्तावेजों और सीसीटीवी फुटेज से जुड़े हैं।
यदि विश्वविद्यालय सचमुच छात्रहित और पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, तो क्या वह यह भी सार्वजनिक करेगा कि पिछले वर्षों में इसी तरह के मामलों में कितने विद्यार्थियों की अंकतालिका “मानवीय दृष्टिकोण” से संशोधित की गई और किन नियमों के तहत की गई? छात्रा के मामले में अपनाया गया “मानवीय दृष्टिकोण” वास्तव में समान नियमों का हिस्सा है या इस विवाद को समाप्त करने के लिए लिया गया एक विशेष फैसला।
फिलहाल अंकतालिका संशोधित हो चुकी है, जांच समिति गठित हो चुकी है और विश्वविद्यालय अपना पक्ष प्रेस नोट के माध्यम से सामने रख चुका है। लेकिन 13 जुलाई की कथित घटना, सीसीटीवी फुटेज और विलंब शुल्क/परीक्षा शुल्क के प्रमाण से जुड़े सवाल अब भी जवाब मांग रहे हैं। जब तक इन सवालों के दस्तावेजी जवाब सामने नहीं आते, तब तक यह मामला केवल एक संशोधित अंकतालिका का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय में पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा का भी बना रहेगा।