पहले रुहेलखंड, अब कुमाऊं? कुमाऊं विश्वविद्यालय के VC की दौड़ में केपी सिंह के नाम की चर्चा ने गरमाई विवि की सियासत, पंतनगर से शुरू होती है कहानी?
नैनीताल/बरेली। कुमाऊं विश्वविद्यालय में नए कुलपति की नियुक्ति को लेकर कवायद तेज होने की चर्चाओं के बीच रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह का नाम संभावित दावेदारों में होने की चर्चा ने विश्वविद्यालय जगत में सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों की मानें तो कुलपति पद के लिए विचाराधीन पांच नामों में प्रो. केपी सिंह का नाम भी शामिल होने की चर्चा है। हालांकि इस सूची की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
74 करोड़ रुपये से ज्यादा की कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप
अप्रैल 2024 में रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह पर 74 करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे। पूर्व वित्त अधिकारी के.के. शंखधार की शिकायत के आधार पर सामने आई रिपोर्टों में बीएड प्रवेश परीक्षा-2022 के गोपनीय मद में करीब 55.50 करोड़ रुपये के अग्रिम भुगतान के समायोजन, परीक्षा के लिए वाहनों पर करीब 15 करोड़ रुपये और कोरोना किट की खरीद में करीब चार करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था।
नियुक्तियों पर सवाल और उपेंद्र कुमार का नाम
केपी सिंह के कार्यकाल में रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग में प्रोफेसर उपेंद्र कुमार की नियुक्ति को लेकर भी शिकायत सामने आई थी। शिकायतकर्ता ने नियुक्ति की पात्रता, अनुभव और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। शिकायत में दावा किया गया कि केपी सिंह जब पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय से जुड़े थे, उस दौरान उपेंद्र कुमार का भी वहां अकादमिक संबंध रहा। इसके बाद केपी सिंह के चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में कुलपति रहने के दौरान भी उपेंद्र कुमार वहां कार्यरत रहे। बाद में केपी सिंह के रुहेलखंड विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के बाद उपेंद्र कुमार की नियुक्ति को लेकर विवाद सामने आया।
पंतनगर से शुरू होती है कहानी?
केपी सिंह मूल रूप से गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर में प्रोफेसर रहे हैं। इसके बाद वे प्रतिनियुक्ति पर चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति बने और फिर 17 अगस्त 2020 को रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति बने। अगस्त 2023 में उन्हें दोबारा रुहेलखंड विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। उपेंद्र कुमार का CCS Haryana Agricultural University से जुड़ा होना स्वतंत्र अकादमिक रिकॉर्ड में भी दिखाई देता है। 2023 के एक शोध प्रकाशन में उन्हें CCS Haryana Agricultural University से संबद्ध बताया गया है। यही वजह है कि पंतनगर से हिसार और फिर रुहेलखंड तक दोनों के संस्थागत संपर्कों की टाइमलाइन इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।
प्रतिनियुक्ति को लेकर भी विवाद
केपी सिंह की खुद की नियुक्ति को लेकर भी पंतनगर विश्वविद्यालय से जुड़ा विवाद सामने आया था। रिपोर्टों के मुताबिक उनकी प्रतिनियुक्ति अवधि पूरी होने के बाद पंतनगर विश्वविद्यालय ने उन्हें मूल विश्वविद्यालय में योगदान देने के लिए कहा था। इसके बावजूद रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उनका कार्यकाल जारी रहा और प्रतिनियुक्ति बढ़ाने को लेकर पत्राचार हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार पंतनगर विश्वविद्यालय ने उनकी प्रतिनियुक्ति अवधि को आगे बढ़ाने के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था। यही मामला बाद में राजभवन तक शिकायत के रूप में पहुंचा। शिकायतकर्ता की ओर से उनकी नियुक्ति और प्रतिनियुक्ति की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए थे।
अब सवाल कुमाऊं विश्वविद्यालय का
यदि सूत्रों की मानें तो कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए संभावित पांच नामों में प्रो. केपी सिंह का नाम है, तो चयन प्रक्रिया पर निगाहें टिकना स्वाभाविक है। कुछ दिन पूर्व संभावित नामों में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. केपी सिंह का नाम भी राज्यपाल गुरमीत सिंह के परिचित होने की वजह से चर्चा में आया था और अब रूहेलखण्ड यूनिवर्सिटी के कुलपति रहे डॉ. केपी सिंह का भी नाम चर्चाओं में है। कुमाऊं विश्वविद्यालय उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण उच्च शिक्षण संस्थानों में से एक है। ऐसे में कुलपति के चयन में उम्मीदवार का अकादमिक अनुभव और प्रशासनिक क्षमता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उसके पिछले कार्यकाल में सामने आए वित्तीय आरोप, नियुक्ति विवाद और प्रशासनिक शिकायतों का रिकॉर्ड क्या रहा है।
क्या विवादों की भी होगी जांच?
राजभवन और सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही हो सकता है कि यदि डॉ. केपी सिंह वास्तव में कुलपति पद की दौड़ में हैं तो क्या उनके खिलाफ सामने आई वित्तीय शिकायतों की स्थिति नियुक्तियों से जुड़े विवादों की स्वतंत्र समीक्षा,पंतनगर विश्वविद्यालय से उनकी प्रतिनियुक्ति के पूरे रिकॉर्ड की जांच और उपेंद्र कुमार के साथ उनके विभिन्न विश्वविद्यालयों में रहे संस्थागत संबंधों की भी पड़ताल की जाएगी? ये सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि कुलपति चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण हैं।
कुमाऊं को चाहिए विवादों से मुक्त नेतृत्व
कुलपति विश्वविद्यालय के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों में से एक है। नियुक्तियां, वित्तीय फैसले, अकादमिक प्रशासन और संस्थागत नीतियां सीधे कुलपति के नेतृत्व से प्रभावित होती हैं। ऐसे में यदि किसी संभावित उम्मीदवार के पिछले कार्यकाल में गंभीर शिकायतें सामने आई हों तो उन शिकायतों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। अगर आरोप जांच में निराधार साबित हो चुके हैं तो उसे भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए और यदि किसी मामले में जांच लंबित है तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। क्योंकि कुमाऊं विश्वविद्यालय को लेकर सवाल किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जवाबदेही का है।