करवाचौथः प्रेम, समर्पण और अटूट दांपत्य का महापर्व कल! जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और रानी वीरवती की पावन कथा, उत्तराखण्ड में पहाड़ से लेकर मैदान तक जबरदस्त उत्साह
रुद्रपुर/हल्द्वानी। भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में करवाचौथ का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि यह प्रेम, अटूट विश्वास, त्याग और दांपत्य जीवन की मंगलकामना का सजीव उत्सव है। विशेष रूप से उत्तर भारत में उल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के संकल्प का प्रतीक है। बदलते सामाजिक परिवेश में इस पर्व का स्वरूप भी अधिक व्यापक और संवेदनशील हुआ है। आज के दौर में कई पति भी अपनी जीवनसंगिनी के साथ निर्जला व्रत रखकर परस्पर आदर, बराबरी और सच्चे साहचर्य की मिसाल पेश कर रहे हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, करवाचौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। (कुछ पंचांगों की गणना के अनुसार इसे आश्विन कृष्ण चतुर्थी भी माना जाता है)। इस वर्ष यह पावन पर्व कल 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। चतुर्थी तिथि का आरंभ 29 अक्टूबर को देर रात 1 बजकर 06 मिनट पर होगा, जो उसी रात 10 बजकर 09 मिनट पर समाप्त होगी। करवाचौथ का व्रत चतुर्थी तिथि और चंद्रोदय के दिव्य संयोग में रखा जाता है, इसलिए 29 अक्टूबर का दिन ही शास्त्र सम्मत है। इस दिन देश के अधिकांश हिस्सों में चंद्रमा के रात 8 बजकर 17 मिनट पर उदित होने का अनुमान है, हालांकि भौगोलिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग शहरों में चंद्रोदय के समय में आंशिक अंतर हो सकता है। करवाचौथ के दिन की शुरुआत भोर में सूर्योदय से पहले होती है। इस समय सास अपनी बहू को स्नेहपूर्वक 'सरगी' भेंट करती हैं, जिसमें फल, मेवे, मिठाइयां और पौष्टिक आहार शामिल होते हैं। सरगी ग्रहण करने के उपरांत व्रती महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास का संकल्प लेती हैं। हालांकि, परंपरा आस्था से जुड़ी है, इसलिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं या विशेष परिस्थितियों में खानपान को लेकर चिकित्सकीय परामर्श का पालन करना पूरी तरह तर्कसंगत है। संध्याकाल में महिलाएं पारंपरिक लाल, गुलाबी या सुनहरे परिधानों में सज-धजकर सोलह शृंगार करती हैं। इसके बाद पूजा स्थल पर मिट्टी या धातु के पावन पात्र 'करवे' में जल भरकर स्थापित किया जाता है। भगवान गणेश, माता पार्वती, भगवान शिव और कार्तिकेय जी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। रोली, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, फल और सुहाग की सामग्री अर्पित कर करवाचौथ की पौराणिक कथा का श्रवण किया जाता है। रात्रि में जब चंद्रदेव आकाश में प्रकट होते हैं, तब महिलाएं अर्घ्य अर्पित करती हैं। इसके पश्चात छलनी की ओट से पहले चंद्रमा और फिर अपने जीवनसाथी का दीदार किया जाता है। पति के हाथों जल ग्रहण कर यह व्रत पूर्णता को प्राप्त होता है।
त्याग और संकल्प का बोध कराती पौराणिक कथा
करवाचौथ से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा रानी वीरवती की है। सात भाइयों की दुलारी इकलौती बहन वीरवती ने विवाह के बाद पहला करवाचौथ व्रत रखा था। भूख-प्यास से व्याकुल बहन का कष्ट भाइयों से देखा नहीं गया। उन्होंने छल से एक ऊंचे पेड़ के पीछे दीप जलाकर छलनी से रोशनी दिखाते हुए चंद्रमा निकलने का भ्रम पैदा कर दिया। वीरवती ने उसे सच्चा चंद्र समझकर अर्घ्य दे दिया और उपवास तोड़ लिया। विधि के विधान के अनुसार, व्रत भंग होते ही उनके पति के प्राण संकट में पड़ गए। असह्य वेदना और पश्चाताप में डूबी वीरवती ने पूरे एक वर्ष तक कठिन तप और देवी की अनन्य साधना की। उनकी सच्ची निष्ठा, भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उनके पति को पुनर्जीवन प्रदान किया। यह कथा सिखाती है कि जीवन की सबसे विषम परिस्थितियों में भी आस्था, धैर्य और सच्चा संकल्प ही सबसे बड़ा संबल बनते हैं। धार्मिक मान्यताओं में माता पार्वती को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव और माता पार्वती का युगल रूप गृहस्थ जीवन के लिए आदर्श संतुलन की प्रेरणा देता है। वास्तव में, करवाचौथ हमें यह संदेश देता है कि दांपत्य जीवन केवल सामाजिक अनुबंध या अधिकारों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता, सम्मान और आत्मिक जुड़ाव से मजबूत बनता है। परंपरा और आधुनिकता के संगम के बीच यह पर्व आज भी हमारे पारिवारिक ताने-बाने को अटूट बनाए रखने की सुंदर कड़ी है।
पहाड़ से मैदान तक करवाचौथ की धूम: उत्तराखंड के बाजारों में उमड़ी सुहागिनों की भीड़
अखंड सौभाग्य के पावन पर्व करवाचौथ को लेकर देवभूमि उत्तराखंड में गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है। पहाड़ से लेकर मैदान तक उत्सव की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर और ऊधम सिंह नगर समेत राज्य के तमाम जिलों के बाजारों में जबर्दस्त रौनक छाई है। 29 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस महापर्व से पहले बागेश्वर के मुख्य बाजारों में सुहागिन महिलाओं का हुजूम उमड़ पड़ा। सुबह से ही साड़ियों, मैचिंग चूड़ियों, पारंपरिक ज्वैलरी, कंगन और पूजा सामग्री की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा रही है। महिलाएं डिजाइनर परिधानों और शृंगार के सामान की जमकर खरीदारी कर रही हैं। त्योहार के नजदीक आते ही कारोबार में आए इस उछाल से स्थानीय व्यापारी बेहद उत्साहित हैं। चारों तरफ सजे बाजार और त्योहार की यह जीवंत उमंग पूरे राज्य को करवाचौथ के रंग में रंग चुकी है।