एमएलसी चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, पीएम मोदी का तीखा तंज: 'बैलेट पेपर से हुए चुनाव, फिर भी ढूंढनी पड़ रही सीटें
नई दिल्ली। चार प्रमुख राज्यों की 28 विधान परिषद (एमएलसी) सीटों पर हुए द्विवार्षिक चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारा झटका लगा है और उसका खाता तक नहीं खुल सका। नतीजों के सामने आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी की निष्पक्ष चुनाव और बैलेट पेपर की पुरानी मांग पर जोरदार तंज कसा है।
चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए हुए चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कर्नाटक में कांग्रेस को सभी चार सीटों पर हार का सामना करना पड़ा, जबकि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने पांच और समाजवादी पार्टी ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की। इन नतीजों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए सवाल किया कि बैलेट पेपर से हुए चुनाव में पार्टी को कितनी सीटें मिलीं। वहीं, जनता दल यूनाइटेड के नेता संजय झा ने भी कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाए। दूसरी ओर, कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जनादेश स्वीकार करते हुए नतीजों की समीक्षा की बात कही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सामाजिक माध्यम ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के जरिए कांग्रेस के प्रदर्शन पर निशाना साधा। उन्होंने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदान मतपत्रों के जरिए हुआ था। इसके बाद उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं। प्रधानमंत्री की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों के स्थान पर मतपत्र से चुनाव कराने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में चुनाव परिणामों को लेकर भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि, विधान परिषद चुनावों के नतीजे अपने आप में पूरे देश के चुनावी रुझान का निर्णायक प्रमाण नहीं माने जा सकते। कर्नाटक में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा, जहां पार्टी अपनी चारों सीटें हार गई। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि पार्टी जनता के फैसले को सम्मानपूर्वक स्वीकार करती है। उन्होंने माना कि कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। पार्टी को दो सीटें जीतने की उम्मीद थी, लेकिन परिणाम उसके पक्ष में नहीं आए। शिवकुमार के मुताबिक, चुनाव परिणामों का विस्तार से विश्लेषण किया जाएगा और जहां सुधार की आवश्यकता होगी, वहां कदम उठाए जाएंगे। कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) ने सत्तारूढ़ कांग्रेस से एक सीट छीन ली, जबकि उसकी सहयोगी भाजपा ने तीन सीटें बरकरार रखीं। इन नतीजों ने राज्य में कांग्रेस के संगठन और चुनावी रणनीति को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में तीन सीटें आईं। बिहार में जन सुराज पार्टी ने अपना खाता खोला। उपलब्ध विवरण के अनुसार, भाजपा, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने भी एक-एक सीट जीती। महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाले सत्ताधारी महायुति गठबंधन के तीन सीटों पर आगे रहने और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट के दो सीटों पर आगे होने की जानकारी दी गई। कुछ सीटों पर मतगणना जारी रहने के कारण वहां की अंतिम स्थिति को लेकर आधिकारिक नतीजों की पुष्टि जरूरी है। जनता दल यूनाइटेड के नेता संजय झा ने चुनाव परिणामों को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने राहुल गांधी के एक नवंबर के ‘दिल्ली चलो’ आह्वान पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को अपने चुनावी प्रदर्शन की वास्तविकता पर भी ध्यान देना चाहिए। झा ने दावा किया कि 28 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस का खाता नहीं खुलना उसके संगठनात्मक आधार और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सवाल खड़े करता है। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार और कर्नाटक में कांग्रेस पहले से जिन सीटों पर काबिज थी, वहां भी उसे नुकसान हुआ। उनके बयान राजनीतिक आरोप हैं; इनसे कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति पर अकेले अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इन चुनाव परिणामों के बाद मतपत्र और इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों को लेकर चल रही बहस एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस की मतपत्र संबंधी मांग का हवाला देकर उसके प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं। वहीं, चुनावी नतीजों का आकलन करते समय निर्वाचन क्षेत्र, उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण और संगठन की स्थिति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। कर्नाटक में हार स्वीकार कर समीक्षा का ऐलान करने वाली कांग्रेस के सामने अब अपने प्रदर्शन की वजह तलाशने की चुनौती है। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दल इन नतीजों को विपक्ष पर राजनीतिक हमला तेज करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस समीक्षा के बाद क्या कदम उठाती है और विपक्षी दल अपनी चुनावी रणनीति में किस तरह बदलाव करते हैं।