Oct 13, 2026 Login
Awaaz24x7-government

जयंती स्पेशल : वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विवि में भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की 134वीं जयंती के उपलक्ष्य पर दी गयी विनम्र श्रद्धांजलि

Jayanti Special: Humble tribute paid on the occasion of 134th birth anniversary of Bharat Ratna Pandit Govind Ballabh Pant at Veer Chandra Singh Garhwali Uttarakhand Horticulture and Forestry Univers

भारत रत्न पं. गोविन्द बल्लभ पंत आधुनिक उत्तर भारत के निर्माता के रूप में याद किये जाते हैं।उत्तराखंड के पहाड़ों में जन्मे गोविंद बल्लभ पंत गोविंद बल्लभ पंत (10 सितंबर 1887- 7 मार्च 1961) का पहला मुख्यमंत्री बनना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी।पंत जी देश भर में सबसे अधिक हिन्दी प्रेमी के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने 4 मार्च, 1925 को जनभाषा के रूप में हिन्दी को शिक्षा और कामकाज का माध्यम बनाने की जोरदार मांग उठाई थी।पंत जी के प्रयासों से हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा मिला। पंत जी ने हिन्दी के प्रति अपने अत्यधिक प्रेम को इन शब्दों में प्रकट किया है− हिन्दी के प्रचार और विकास को कोई रोक नहीं सकता। हिन्दी भाषा नहीं भावों की अभिव्यक्ति है।आज गोविंद वल्लभ पंत जी की 134 वीं जयंती के उपलक्ष्य पर वीर चन्द्र सिंह गढवाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखण्ड) में उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई।इस मौके पर डा.एके कर्नाटक, (कुलपति) ने कहा कि भारत के स्वतन्त्रता संग्राम एवं आजादी के बाद भारत के विकास को पूरी दुनिया एक अलग नजर से देखती है। इस विशिष्ठ स्वतन्त्रता संग्राम की विशेषता यह रही है कि भारतवासियों ने आजादी की लडाई अंहिसा के हथियार से लड़ी और ऐसा उदाहरण विश्व में दूसरा कहीं नही है। दूसरी प्रमुख विशेषता रही है आजादी के बाद ‘‘सुशासन’’, ‘‘विकास’’। इसका प्रमुख कारण यह था कि आजादी की लडाई में और उसके बाद देश के विकास में प्रमुख भूमिका बुद्विजीवियों द्वारा निभाई गई।राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी, आदरणीय मोतीलाल नेहरु, पं0 जवाहर लाल नेहरु, लाला लाजपत राय, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, प0 राजेन्द्र प्रसाद, कैलाश नाथ काटजू, भीम राव अम्बेडकर, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प0 गोविन्द बल्लभ पंत, आचार्य नरेन्द्र देव के योगदान को व उनके जीवन व्रत को अगर हम ध्यान से देखे तो यह सभी बुद्विजीवी थे और पेशे से ज्यादातर या तो वकील या शिक्षक रहे,यही कारण है कि देश के विकास को एक नयी गति मिली और देश ने दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति की।इन्हीं महान विभूतियों मे से एक देश की उन्नति मे अपना अतुल्नीय योगदान देने वाले प0 गोविन्द बल्लभ पंत जी के जन्मदिन को मनाने हेतु हम सब यहॉ एकत्र हुये है। पंडित पंत जी के जीवन पर, कार्यों को जन-जन तक विशेष रुप से युवा पीढी तक पहुॅचाने के लिये गोविन्द बल्लभ पंत मैमोरियल सोसाइटी नेचार वर्श पूर्व पंत पथ के नाम से फेसबुक पर एक पृष्ठ लॉच किया था आप www.facebook.com/pant path पर जाकर उनसे सम्बन्धित सभी जानकारी प्राप्त कर सकते है। 


चूॅकि पं. पन्त जी के जीवन व कार्याें के सम्बन्ध में हम सभी भिज्ञ हैं और हर वर्ष उनका जिक्र करते है ,कुलपति डॉ एके कर्नाटक ने पंडित पंत जी के युवाओं के सम्बन्ध में विचार, शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान व उनकी प्रशासनिक क्षमता के सम्बन्ध मे कुछ बाते भी रखी ।


1- पं. पंत का जन्म अनन्त चतुदर्शी के दिन 19 भादप्रद विक्रम संवत् 1944 सन् 1887 को अल्मोडा जिले के स्याल देवी पहाडों की तलहटी में बसे एक ग्राम खूॅट में हुआ था, सन 1887 में अनन्त चतुदर्शी 30 अगस्त को थी, अतः पंडित जी के जन्म की सही तिथि 30 अगस्त ही है परन्तु चूंकि 1946 में जब पहली बार लखनऊ में इनका जन्मदिन मनाया गया, उस वर्ष अनन्त चतुदर्शी 10 सितम्बर को थी। अतः इसी तिथि को उनके जन्मदिन की तिथि की मान्यता मिली।


2- शिक्षा को विकास का द्वार मानने वाले पंडित पन्त प्रारम्भ से मेधावी छात्र थे। सन 1909 में उन्होनें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। बच्चों की शिक्षा पर पन्त बहुत जोर देते थे व इसके लिए कई परिवारों को हर महीने आर्थिक सहायता भी देते थे। 1918 में काशीपुर में पंत जी के प्रयास से ही उदयराज हिन्दू हाईस्कूल की स्थापना हुई थी।


3. पं.पन्तजी समय प्रबन्ध time management पर विशेष ध्यान देते थे। उनका मत था कि व्यक्ति, प्रदेश व देश की प्रगति के लिए समय का पालन अत्यन्त आवश्यक है।


4- एक बात युवाओं के लिए पन्त जी और कहते थे, वह थी कि बचपन से ही किसी कार्य के लिए सकारात्मक रुख अपनाने की आदत डालनी चाहिए। हर समस्या पर सकारात्मक रुख अपनाना पन्त जी की आदत मे शुमार था। वे कभी नाराज नही होते थे व हर बात जो उनके संज्ञान मे लायी जाती थी चाहे वह उन्हें पसंद हो या नापसंद, उस पर विचार व मनन अवश्य करते थे।


5- शोध को प्रगति का एक पहिया कहते थे पन्त जी, पन्तजी का मानना था कि शोध का उपयोग मानवता की भलाई के लिए होना चहिए। 


6- पन्त जी दृढ इच्छा शक्ति के स्वामी थे। पन्त जी की दृढ इच्छा शक्ति व व्यक्तित्व के सम्बन्ध मे एक रोचक प्रसंग है। चीन द्वारा प्रकाशित नक्शों में भारतीय क्षेत्र पर चीन द्वारा दावा किये जाने के पश्चात् जब 1960 में चाऊ एन लाई भारत आये तो पन्त जी के साथ उनकी बैठक हुई ।भेंट के उपरान्त जब चाऊ एन लाई से प्रतिक्रिया पूछी गयी तो उन्होंने कहा ‘ पंत जी कट्टर व्यक्ति है उनसे पार पाना कठिन है’। गृह मंत्री के रुप मे राज्यों के पुर्नगठन में भी पन्त जी की प्रशासनिक क्षमता सारे देश को दिखायी दी और उन्होंने बहुत सहजता से इस कार्य को पूर्ण किया था।

 
7- पुस्तकों का अध्ययन पं. पंत का प्रमुख गुण था। जेल से लिखे गये एक पत्र मे उन्होनें अपने पुत्र राजा को लिखा था कि क्या तुमने ‘ लिटिल मैन’ देखी, तुमने कौन-कौन सी नई किताबे पढी है मुझे लिखना।


8- पद की अपेक्षा पं. पंत जी कार्य को महत्ता देते थे । 1950 में जब पं. जवाहर लाल नेहरु ने पन्त जी के समक्ष केन्द्र में आने का प्रस्ताव रखा व उन्हें वित्त मंत्री का पद देने की पेशकश की तो उन्होनें उत्तर प्रदेश के अधूरे कार्यो का हवाला देते हुए सादर पूर्वक 3 मई, 1950 को पं. नेहरु को पत्र लिखकर इस महत्वपूर्ण पद को ठुकरा दिया। हांलाकि 1954 में पुनः अनुरोध होने पर उन्होंने भारत के गृहमंत्री के पद को सुशोभित किया।


9- 14 जून 1929 को गॉधी जी की कुमॉऊ यात्रा हल्द्वानी से शुरु हुई। गॉधी जी कुमॉऊ में 14 जून से 4 जुलाई तक रहे, पर गॉधी जी का असर पं. पन्त पर काफी पहले से था। उन्ही की प्रेरणा से कुमॉऊ केसरी पं. बद्रीदत्त पाण्डे जी के साथ मिलकर 13 जनवरी 1921 को संक्रान्ति के अवसर पर पं. पन्त ने सरयू नदी के किनारे 15 हजार के जन समुदाय के साथ कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने का बीड़ा उठाया। देश के स्वतन्त्रता संग्राम इतिहास में कुमाऊॅ में घटित इस घटना को अग्रेंजों के विरुद्व आन्दोलन में एक महत्वपूर्ण चिंगारी के रुप में जाना जाता है।


10- पंत जी की प्रशानिक क्षमता अद्वितीय थी। जमीदारी प्रथा उन्मूलन इसका एक प्रमुख उदाहरण है। साइमन कमीशन के विरुद्व जन आन्दोलन खडा करने में भी पंत जी की भूरी-भूरी प्रंसशा हुई थी। इस आन्दोलन में लगी चोटों का दर्द पन्त जी को जीवन पर्यन्त रहा।


11- शाकाहार के पं. पन्त बहुत प्रबल समर्थक थे। गॉधी जी के मूल मंत्र अहिंसा को उन्होंने पूर्णरूपेण अपनाया था। पंडित पन्त कहते थे जीवन अमूल्य है, हर कीमत पर इनकी रक्षा होना आवश्यक है।


12-भोजन की स्वछता व सभी परिवारजनों के साथ बैठकर भोजन करना उनके परिवार का नियम था, पंडित पन्त का मानना था कि मनुष्य का भोजन व विचार एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।


13-दूर दृष्टि पं. पन्त का एक प्रमुख गुण था। 1960 में पन्तनगर में एशिया के प्रथम कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना इसका प्रमाण है। इन्ही सब गुणों व देश की सेवा के लिए पन्त जी को वर्ष 1957 में भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया गया। 


14-20 फरवरी सन् 1961 में जब वे सरकारी काम में व्यस्त थे, उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने हमेशा के लिए अपनी चेतना खो दी और 7 मार्च 1961 को इस महापुरुष का देहान्त हो गया।


15- इन्ही सब महान गुणों के धनी प्रातः स्मरणीय, स्वनाम धन्य भारत रत्न पं0 गोबिन्द बल्लभ पंत जी के चरणों में उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात समाप्त की और माननीय पंत जी के सम्मान में श्रंद्वाजलि के रूप मे राष्ट्र कवि पद्मश्री सोहन लाल द्विवेदी जी की पंक्तियॉं भी उद्दृत की।
 

"पर्वत कहता सीस उठाकर,
तुम भी ऊंचे बन जाओ,
सागर कहता है लहराकर,
मन मे गहराई लाओ,
पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो,
कितना ही हो सिर पर भार,
नभ कहता है फैलो इतना,
ढक लो तुम सारा संसार।"