लोकायुक्त नियुक्ति पर हाईकोर्ट सख्त: धामी सरकार से मांगी स्टेटस रिपोर्ट,6 सप्ताह बाद अगली सुनवाई

High Court firm on Lokayukta appointment: Seeks status report from Dhami government; next hearing in 6 weeks.

उत्तराखंड में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। हल्द्वानी (गौलापार) निवासी आरटीआई कार्यकर्ता रवि शंकर जोशी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने धामी सरकार को अब तक की प्रगति पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 6 सप्ताह बाद की तिथि नियत की है। इस सुनवाई ने राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत और स्वतंत्र तंत्र की कमी को एक बार फिर से चर्चा में ला दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि राज्य में लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन के लिए जल्द ही सर्च कमेटी (खोज समिति) अपनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाली है। हाईकोर्ट ने इसे संज्ञान में लेते हुए सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक इस दिशा में हुए ठोस कार्यों की रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाए। याचिकाकर्ता रवि शंकर जोशी ने कोर्ट के सामने बेहद चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में साल 2013 से लोकायुक्त का पद पूरी तरह से खाली पड़ा है। इसके बावजूद इस निष्क्रिय संस्थान के नाम पर हर साल जनता की गाढ़ी कमाई के 2 से 3 करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। याचिका में कर्नाटक और मध्य प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा गया कि वहां लोकायुक्त भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े एक्शन ले रहे हैं, जबकि उत्तराखंड में छोटे से छोटे घोटाले के मामले को भी नागरिकों को कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

जनहित याचिका में राज्य की मौजूदा जांच व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वर्तमान में उत्तराखंड की सभी जांच एजेंसियां पूरी तरह से सरकार और राजनीतिक नेतृत्व के नियंत्रण में हैं। पूरे राज्य में ऐसी एक भी स्वतंत्र एजेंसी नहीं है जो शासन की पूर्वानुमति (मंजूरी) के बिना किसी भी राजपत्रित अधिकारी (गजेटेड ऑफिसर) के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज कर सके। स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का दावा करने वाला विजिलेंस विभाग भी राज्य पुलिस का ही एक हिस्सा है, जिसका पूरा कंट्रोल मुख्यमंत्री कार्यालय या सतर्कता विभाग के पास रहता है। ऐसे में पारदर्शी जांच की उम्मीद बेमानी है। इसी सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने लोकायुक्त कार्यालय के नौ कर्मचारियों के वेतन भुगतान का मानवीय मुद्दा भी उठाया। सरकार की ओर से कहा गया कि पूर्व में अदालत द्वारा वेतन जारी करने का जो आदेश दिया गया था, वह समयबद्ध था और उसकी अवधि समाप्त हो चुकी है। सरकार ने कोर्ट से अनुरोध किया कि इस आदेश की अवधि को आगे बढ़ाया जाए ताकि इन नौ कर्मचारियों का रुका हुआ वेतन जारी किया जा सके। याचिका में साफ कहा गया है कि उत्तराखंड के नागरिकों के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच व्यवस्था बेहद जरूरी है। यदि लोकायुक्त की नियुक्ति शीघ्र की जाती है, तो राज्य में पनप रहे करप्शन पर प्रभावी रोक लगेगी। सभी भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की सुनवाई लोकायुक्त के पास होने से न केवल दोषियों को सजा मिलेगी, बल्कि उच्च न्यायालयों पर मुकदमों का बढ़ता बोझ भी काफी कम होगा। अब देखना यह है कि 6 हफ्ते बाद सरकार कोर्ट में क्या जवाब दाखिल करती है।