भक्ति या बर्बादी?नर्मदा नदी में बहाया 11 हजार लीटर दूध! स्कूलों में बच्चों को दिया जाता है मिलावटी दूध,नदी को चढ़ाया जाता है शुद्ध दूध! ये पुण्य या पाप? देश में छिड़ी नई बहस
सीहोर/मध्य प्रदेश:
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले से सामने आया एक वीडियो इन दिनों देशभर में बहस का कारण बन गया है। नर्मदा नदी में करीब 11,000 लीटर दूध बहाए जाने की घटना ने आस्था, सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरणीय संतुलन—तीनों को एक साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दूध क्यों बहाया गया, बल्कि यह भी है कि जिस राज्य में लाखों बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हों, वहां इतनी बड़ी मात्रा में पोषण का प्रतीक यूं नदी में बहा देना क्या वास्तव में धर्म है या दिखावे का नया संस्करण?

चैत्र नवरात्रि के दौरान भैरूंदा तहसील के सातदेव स्थित पातालेश्वर महादेव मंदिर में 21 दिन तक चले भव्य अनुष्ठान के समापन पर यह आयोजन किया गया। आयोजकों के मुताबिक, यह पूरी तरह श्रद्धा का विषय है और भक्तों ने अपने संसाधनों से यह अर्पण किया। 5 एकड़ में फैले पंडाल, 41 टन पूजन सामग्री और सोने-चांदी तक के उपयोग के बीच यह आयोजन भव्यता की मिसाल बताया जा रहा है।
लेकिन यहीं से सवाल शुरू होते हैं कि क्या भव्यता ही भक्ति का पैमाना है?
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। एक ओर भक्त इसे “मां नर्मदा को समर्पण” बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जागरूक वर्ग इसे संसाधनों की बर्बादी कह रहा है। आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में 10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं और लाखों महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। ऐसे में हजारों लीटर दूध नदी में बहाना कई लोगों को “आस्था के नाम पर असंवेदनशीलता” जैसा प्रतीत हो रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञ भी इस घटना को हल्के में नहीं ले रहे। उनका कहना है कि दूध जैसी जैविक सामग्री जब बड़ी मात्रा में पानी में मिलती है, तो पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) बढ़ जाती है। इसका सीधा असर नदी में घुलित ऑक्सीजन पर पड़ता है, जिससे मछलियां और अन्य जलीय जीव प्रभावित होते हैं। यानी आस्था का यह प्रवाह, पारिस्थितिकी के लिए अवरोध बन सकता है।
दुनिया के कई देशों में नदियों और जलस्रोतों को प्रदूषित करने पर कड़े नियम हैं। यूरोप के देशों जैसे यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी में किसी भी प्रकार के खाद्य या रासायनिक पदार्थ को नदियों में डालना पर्यावरण अपराध माना जाता है और इस पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। हालांकि “दूध बहाने” जैसी धार्मिक परंपरा वहां प्रचलित नहीं है, इसलिए ऐसे विशेष मामलों के उदाहरण नहीं मिलते, लेकिन जल प्रदूषण के हर रूप पर सख्ती जरूर है।
कुछ देशों में डेयरी उद्योग से निकले दूध के अपशिष्ट को नदियों में बहाने पर कार्रवाई हुई है और कंपनियों पर जुर्माना भी लगाया गया है। यानी वहां “दूध” भी अगर पानी को खराब करता है, तो वह पवित्र नहीं बल्कि प्रदूषक माना जाता है।
जहां एक तरफ बच्चे एक गिलास दूध के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नदियां “दूध से स्नान” कर रही हैं।

एक ओर स्कूलों में बच्चों को मिड-डे मील में मिलावटी दूध दिया जा रहा है, दूसरी ओर हजारों लीटर शुद्ध दूध नदी में अर्पित किया जा रहा है। सवाल यह नहीं कि आस्था गलत है, सवाल यह है कि क्या आस्था के नाम पर विवेक को किनारे रख देना सही है?क्या भगवान को सच में दूध चाहिए, या उन बच्चों को जिनकी हड्डियां आज भी कुपोषण से कमजोर हैं?
यह बहस अब सिर्फ सीहोर तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश के सामने एक आईना बनकर खड़ी है । जहां आस्था और जिम्मेदारी के बीच संतुलन तलाशना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
बता दें कि नर्मदा, जो अमरकंटक से निकलकर महाराष्ट्र और गुजरात होते हुए अरब सागर में मिलती है, सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। ऐसे में उसके जल को प्रदूषित करने वाली हर गतिविधि सीधे जनजीवन को प्रभावित करती है।