देहरादून मस्जिद सीलिंग केस:मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण को राहत! उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जामा मस्जिद सोसायटी की याचिका खारिज की
देहरादून में मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) द्वारा एक मस्जिद को सील किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना वैधानिक अनुमति के निर्माण करने वाले व्यक्ति या संस्था को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत नहीं दी जा सकती।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Pankaj Purohit की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता Jama Masjid Society Thano ने 13 फरवरी 2026 को मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण द्वारा जारी उस नोटिस को निरस्त करने की मांग की थी, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून को मस्जिद को सील करने हेतु पुलिस सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे।
याचिका में यह भी अनुरोध किया गया था कि सोसायटी को नियमानुसार कंपाउंडिंग मानचित्र प्रस्तुत करने का अवसर दिए बिना किसी प्रकार की दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य स्वीकार किया गया कि संबंधित निर्माण के लिए प्राधिकरण से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। साथ ही, अवैध निर्माण के कंपाउंडिंग के लिए भी कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया था।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जो पक्ष स्वयं कानून का उल्लंघन कर रहा हो, वह न्यायालय से संरक्षण की अपेक्षा नहीं कर सकता। बिना अनुमति निर्माण कर बाद में न्यायिक राहत की मांग करना विधिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी अवैध निर्माण को संरक्षण देने का माध्यम नहीं बन सकता। इसी आधार पर याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दिया गया।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वह चार सप्ताह के भीतर अवैध निर्माण की कंपाउंडिंग के लिए संबंधित प्राधिकरण के समक्ष आवश्यक दस्तावेजों सहित आवेदन प्रस्तुत करता है, तो मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 (जो उत्तराखंड में लागू है) के प्रावधानों के तहत चार सप्ताह के भीतर उस पर विचार करेगा।
इसके साथ ही मामले से संबंधित सभी लंबित प्रार्थना-पत्रों का भी निस्तारण कर दिया गया।