दिल्ली हाईकोर्ट में अरविंद केजरीवाल ने खुद पेश की अपनी दलीलें!जज बदलने की मांग से मचा बवाल,10 तर्कों से खड़े किए बड़े सवाल,तर्क भी ऐसे कि हर कोई हो गया हैरान
दिल्ली हाईकोर्ट में उस दिन एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने कोर्टरूम की पारंपरिक तस्वीर को ही बदल दिया। जहां आमतौर पर बड़े-बड़े अधिकारी जज के सामने बोलते हुए हिचकते हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने खुद खड़े होकर करीब एक घंटे तक अपनी दलील रखी—वो भी पूरे आत्मविश्वास और सीधे अंदाज़ में। मामला है शराब नीति केस का, जिसमें ट्रायल कोर्ट से राहत मिलने के बाद अब Central Bureau of Investigation (CBI) ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

इस केस की सुनवाई Justice Swarana Kanta Sharma कर रही हैं। लेकिन केजरीवाल ने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर साफ कहा—इस केस की सुनवाई कोई और जज करे।

केजरीवाल ने अपने हलफनामे में कई ऐसे तर्क रखे, जिन्होंने कोर्टरूम में हलचल पैदा कर दी। उन्होंने दावा किया कि जज के परिवार के सदस्यों का केंद्र सरकार से जुड़ा पेशेवर संबंध है। खासतौर पर सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta, जो इस केस में CBI की तरफ से पेश हो रहे हैं, उनके जरिए जज के बच्चों को सरकारी मामलों में काम मिलने की बात कही गई।
RTI से मिले दस्तावेजों का हवाला देते हुए केजरीवाल ने कहा कि 2023 से 2025 के बीच जज के बेटे को बड़ी संख्या में कानूनी काम दिए गए। उनका तर्क था कि ऐसे हालात “हितों के टकराव” (conflict of interest) की स्पष्ट आशंका पैदा करते हैं, जिससे निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल उठ सकते हैं।

इतना ही नहीं, केजरीवाल ने कोर्ट की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी दलील पूरी करने का पर्याप्त मौका नहीं मिला। उनका आरोप है कि वे कोर्ट से अनुमति लेकर शाम करीब 3:45 बजे निकल गए थे, लेकिन सुनवाई रात 7 बजे तक जारी रही और उसी दिन खत्म भी हो गई—जिससे उन्हें जवाब देने का मौका नहीं मिला।
हालांकि, केजरीवाल ने यह भी साफ किया कि वे जज की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि सिर्फ यह कह रहे हैं कि परिस्थितियां ऐसी हैं जो उनके मन में निष्पक्ष न्याय को लेकर संदेह पैदा करती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद 13 अप्रैल को कोर्ट ने इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि हाईकोर्ट इस संवेदनशील मांग पर क्या फैसला देता है—क्या जज बदलेंगे या केजरीवाल की दलील खारिज होगी?
कुल मिलाकर, दिल्ली हाईकोर्ट में यह सुनवाई सिर्फ एक केस नहीं रही, बल्कि न्याय व्यवस्था, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर बड़ा सवाल बनकर उभरी है।