Sep 11, 2026 Login

12-13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में सजेगा वैश्विक मंच! पुतिन, शी जिनपिंग समेत जुटेंगे दुनिया के शीर्ष नेता

A global stage will be set at Delhi's Bharat Mandapam on September 12–13! Top world leaders, including Putin and Xi Jinping, will gather there.

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के अत्याधुनिक 'भारत मंडपम' में 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने जा रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की वैश्विक कूटनीति के लिए एक बड़ा 'गेम चेंजर' साबित होने जा रहा है। भारत की अध्यक्षता में हो रही इस ऐतिहासिक समिट के जरिए देश 'ग्लोबल साउथ' के निर्विवाद नेता और पावर हाउस के रूप में उभरने को तैयार है। स्वीडन स्थित प्रमुख थिंक टैंक 'इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट पॉलिसी' की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस सम्मेलन से भारत का वैश्विक दबदबा न केवल काफी बढ़ेगा, बल्कि वह संगठन के भीतर चीन के बढ़ते प्रभाव को भी प्रभावी ढंग से संतुलित करने में सफल रहेगा।

भारत की मेजबानी में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन देश की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। 12 और 13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले सम्मेलन के जरिए भारत न केवल ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देने की तैयारी में है, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी रणनीतिक भूमिका को भी विस्तार देना चाहता है। स्वीडन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिक्स के विस्तार से भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाने और विकासशील देशों के हितों को मजबूती से रखने का बड़ा अवसर मिल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ब्रिक्स के जरिए मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि वैश्विक संस्थानों में अपनी ‘बारगेनिंग पावर’ बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में सुधार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा संस्थाएं आज की आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ऐसे में ब्रिक्स का बढ़ता दायरा भारत के सुधारवादी एजेंडे को अतिरिक्त ताकत दे सकता है। ब्रिक्स प्लस भारत को एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के विकासशील देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने का अवसर देता है। सम्मेलन में विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने, जलवायु परिवर्तन के नाम पर उनके विकास हितों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत बनाने जैसे मुद्दों पर चर्चा की उम्मीद है। भारत अपने सफल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और यूपीआई मॉडल को भी दूसरे देशों के साथ साझा करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को बढ़ावा देना भी ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। ब्रिक्स के विस्तार को अक्सर चीन के प्रभाव में बढ़ोतरी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन ISDP की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लिए नए सदस्य केवल चुनौती नहीं, बल्कि अवसर भी हैं। नए देशों के शामिल होने से भारत को संगठन के भीतर नए साझेदार मिल सकते हैं। इससे भारत ब्रिक्स को केवल चीन-केंद्रित मंच बनने से रोकने के लिए व्यापक गठबंधन तैयार कर सकता है। हालांकि, यह रणनीति आसान नहीं होगी। भारत को चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाते हुए ब्रिक्स के एजेंडे को आगे बढ़ाना होगा। साथ ही रूस के साथ अपने पारंपरिक रिश्तों को बनाए रखना और पश्चिमी देशों के साथ तनाव बढ़ने से बचना भी भारत की प्राथमिकता रहेगी। ईरान और मध्य पूर्व के देशों के हितों को समायोजित करते हुए भारत ब्रिक्स को पूरी तरह पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकने की कोशिश कर सकता है। ब्रिक्स ने भारत को एक ऐसा कूटनीतिक मंच दिया है जहां वह चीन और रूस के साथ बैठकर संवाद कर सकता है, वहीं अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते भी मजबूत कर सकता है। अब ब्रिक्स प्लस के जरिए मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के प्रभावशाली देशों से भारत की कूटनीतिक पहुंच और बढ़ सकती है। भारत की कोशिश होगी कि नई दिल्ली में होने वाला यह सम्मेलन न तो किसी अमेरिकी खेमे का समर्थक नजर आए और न ही रूसी-चीनी धड़े का हिस्सा। यही भारत की ‘गुटनिरपेक्षता से आगे रणनीतिक स्वायत्तता’ वाली विदेश नीति का मूल आधार है। भारत मंडपम में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में 11 पूर्ण सदस्य देश हिस्सा ले रहे हैं। इनमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं। इसके अलावा मलेशिया, थाईलैंड, कजाकिस्तान और बेलारूस जैसे साझेदार देशों तथा वियतनाम और उज्बेकिस्तान जैसे आमंत्रित देशों की भागीदारी भी प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद समेत कई प्रमुख नेता इसमें शामिल होने वाले हैं। इस बार सम्मेलन की थीम लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता का निर्माण रखी गई है। वैश्विक संगठनों में सुधार, सप्लाई चेन में विविधता, व्यापार विस्तार, स्थानीय मुद्रा में लेनदेन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, खाद्य-ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन जैसे मुद्दे एजेंडे में रहेंगे। कुल मिलाकर, दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर है। असली परीक्षा यह होगी कि भारत ब्रिक्स प्लस के बढ़ते दायरे को किस तरह अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के पक्ष में इस्तेमाल करता है। यदि भारत विभिन्न धड़ों के बीच संतुलन बनाते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सफल रहता है, तो आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति में उसका प्रभाव और मजबूत हो सकता है।