Aug 19, 2026 Login

दलबदल राजनीति पर 40 वर्ष पहले नैनीताल के अध्यापक, बेहतरीन कवि,लेखक और संगीतज्ञ स्व श्री पीतांबर दत्त तिवारी ने लिख दी थी आज की कड़वी सच्चाई, ये प्रासंगिक कविता मानो आज ही लिखी हो

40 years ago, Nainital's teacher, best poet, writer and musician Late Shri Pitamber Dutt Tiwari had written on defection politics, today's bitter truth, this relevant poem as if written today.

भारतीय राजनीति में 'दल-बदल' काफी प्रचलित है। इसे आसान भाषा में आप कह सकते हैं कि सांसद या विधायक द्वारा एक दल (अपना दल) छोड़कर दूसरे दल में शामिल होना। जिस तरह से सासंद और विधायक अपने राजनीतिक और निजी लाभ के लिए दल बदलते रहते हैं, इसलिए राजनीति में इन्हें 'आया राम, गया राम' कहा जाता है। आज की राजनीति तो मानो आया राम गया राम पर ही निर्भर हो चुकी है। 5 राज्यो में विधानसभा चुनाव होने वाले है, तमाम नेता यहां से कूद कर वहां दूसरे दलों में शामिल हो रहे है। इन दलबदलू नेताओ पर 40 वर्ष पहले ही एक मजेदार कविता लिखी जा चुकी है। नैनीताल निवासी अमर उजाला के ब्यूरो चीफ और कुमाऊं विवि के डीएसबी कैम्पस में अटल पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के एचओडी प्रो गिरींश रंजन तिवारी के पिता अपने जमाने के प्रसिद्ध कवि,लेखक,संगीतज्ञ और अध्यापक रहे स्व श्री पीतांबर दत्त तिवारी ने दलबदल-आओ बंधु चलो उस पार" नाम की कविता 40 वर्ष पहले लिखी थी जो आज  के परिपेक्ष्य में अक्षरः अक्षरः एक दम सटीक बैठती है।
 *दलबदल*

*आओ बंधु चलो उस पार*

अब क्या धरा हुआ इस दल में,
केवल दलदल है बेकार।
उसी तरफ को हवा  चल रही,
उसी तरफ को बहती धार।
अकलमंद सब वहीं जा रहे,
जहां मिलें फूलों के  हार।
भारत की नय्या को खेने,
बारी बारी दो दो चार।
नैतिकता को धरो किनारे,
वहीं रोशनी वहीं बहार।
इस दल से अब बहुत पा लिया,
बंगला, रुपया, मोटर कार।
अब ज्यादा कुछ वहीं मिलेगा,
इससे आगे का संसार।
इस दुकान में बहुत खा लिया,
हलवा, पूरी, खीर, अचार।
उस दल में अब मिल जायेगा,
खाने को पूरा बाजार।

इस दल की वो साख कहां है,
होगी यहां करारी हार।
अंतरात्मा बोल रही है,
सुन लो मत चूको इस बार।
यहीं अगर तुम पड़े रहे तो,
हो जायेगा जीवन भार।
वह बुलबुल है मूर्ख बहुत जो,
नहीं छोड़ती गिरती डार।
तुम तो मानव हो फिर इसका,
नहीं जानते क्या उपचार?
कुर्सी वहीं मिलेगी तुमको,
जहां गढ़ी जाती सरकार।
रिझा लिया यदि तुमने उनको,
हो जायेगा बेड़ा पार।
क्या कहते हो यदि भविष्य में,
 इसी ओर चल पड़ी बयार?
तो फिर  तुम वापस  आ जाना,
अपनी केंचुल फेंक उतार।
देखा नहीं कभी गिरगिट को,
रंग बदलता कितनी बार।
उसको ही तुम गुरु बनाओ,
मतलब साधो अपना यार।
फिर तुम्हारा होगा शासन,
तुम्हीं करोगे देशोद्धार।
जुड़ी खुशामद में  आमद है,
समझो तुम यह गूढ़ विचार।
थोड़ा मक्खन सदा साथ में,
 रखना अपने भली प्रकार।
देखा होगा मक्खन बाजी,
की महिमा है अपरम्पार।
यही रीति है यही नीति है,
इसमें ही जीवन का सार।
उन्नति होती रही इसी से,
बाकी सबका  बंटा धार।
स्वार्थ सिद्धि हो लक्ष्य तुम्हारा,
कोई कुछ भी कहे पुकार।
जनहित का नारा दो सबको,
कहो करेंगे पर उपकार।
यदि चाहो दुष्कृत छुप जाएं,
सबसे मिले तुम्हें सत्कार।
छोड़ो किसी बहाने यह दल,
आओ बंधु चलो उस पार।