वाह रे सरकार: उत्तराखंड पर कर्ज का बोझ और विधायकों की मौज ही मौज! एक बार फिर बढ़ी माननीयों की सैलरी
उत्तराखंड में जिस तरह से माननीयों के ठाठ-बाट हैं,सरकारी खर्चे हैं। उससे दूर-दूर तक इस बात का एहसास नहीं किया जा सकता कि यह वही उत्तराखंड है, जो हज़ारों करोड़ रुपये के कर्ज़ में डूबा हुआ है। अगर आप विधायकों के सरकारी खर्च का डेटा देखें या सुनें तो आपको भी हैरत हो सकती है। उत्तर प्रदेश से अलग होकर 2000 में उत्तराखंड बना था और तबसे देखा जाए तो माननीयों पर सरकारी खज़ाने का कई करोड़ रुपया खर्च हो चुका है।
उत्तराखंड करीब 90 हजार करोड़ के कर्ज के बोझ तले दबा है। दूसरी तरफ सरकार विधायकों की सुख सुविधाओं का पूरा ख्याल रख रही है। विधायकों के वेतन भत्ते बढ़ाने संबंधी विधेयक के आज गैरसैंण में हो रहे विधानसभा सत्र में पेश किया गया। तदर्थ समिति की संस्तुतियों के आधार पर विधेयक में विधायकों के वेतन, भत्ते ड्राइवर का वेतन, कूपन कैश कराने जैसी सिफारिशें की गई हैं। 70 सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा के सदस्यों को अब प्रतिमाह वेतन-भत्ते के रूप में लगभग चार लाख रुपए मिलेंगे। बढ़ती महंगाई को देखते हुए तदर्थ समिति ने विधायकों के वेतन-भत्तों के साथ ही उनके वैयक्तिक सहायक के वेतन में वृद्धि की संस्तुति की थी। अभी तक विधायकों को वेतन भत्ते के रूप में प्रतिमाह लगभग 2.90 लाख रुपए मिलते हैं। पंचम विधानसभा का गठन होने के बाद गत वर्ष विधायकों की सदन एवं निर्वाचन क्षेत्र, सेवा शर्तों पर विचार के लिए विधायक प्रीतम सिंह पंवार की अध्यक्षता में तदर्थ समिति गठित की गई थी। समिति ने सभी पहलुओं पर विमर्श के बाद अपना प्रथम प्रतिवेदन सौंपा, जिसे सरकार ने बुधवार को मानसून सत्र के पहले सदन में पेश किया। विधायकों के वेतन भत्तों में अलग-अलग मदो में तकरीबन 1 लाख रुपए तक की बढ़ोत्तरी की गई है।
उत्तराखंड जब उत्तरप्रदेश से अलग हुआ था सभी ने यही सोचा था की अब प्रदेश के सभी लोगों को बेहतर सुविधा मिलेगी लेकिन आज यहां पैदा होने वाला हर बच्चा कई हजारो रुपये से ज्यादा का कर्जदार है। राज्य पर अभी करीब 90 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज है। यहां के लगभग 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। हालांकि इन्ही गरीबों की नुमाइंदगी विधानसभा में करने वाले सीएम, नेता प्रतिपक्ष,मंत्री और विधायक सब फल फूल रहे हैं। राज्य बनने के बाद कई बार इनके वेतन, भत्ता और सुविधाओं में इजाफे को लेकर प्रस्ताव सदन में पेश हो चुका है। और बार बढ़ी आसानी से प्रस्ताव पास भी हो जाता है। अक्सर सदन में तमाम मुद्दों को लेकर टकराने वाले पक्ष-विपक्ष इस मुद्दे पर बिल्कुल शांत रहते हुए इस मुद्दे में सहमत हो जाते है। 1 करोड़ से कुछ ही ज़्यादा की आबादी वाले इस छोटे राज्य पर 90,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का कर्ज़ चढ़ा हुआ है। इन आंकड़ों के बाद यह भी एक फैक्ट है कि सरकारी कामकाज में खर्च पर कंट्रोल के निर्देश अक्सर जारी होते हैं,लेकिन विधायकों के खर्च का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। एक तरफ जानकार मान रहे हैं कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार को इस बारे में विचार करना होगा। खर्चों में कटौती करना मुख्यमंत्री का विवेक है। अगर खर्चों में बढ़ोत्तरी हो रही है, तो इसमें कमी होनी आवश्यक है क्योंकि प्रदेश लगातार कर्ज़ में है।