Oct 12, 2026 Login
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उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस:मैं बे पनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ?मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं!

Uttarakhand State Foundation Day: How do I tell the morning to shelter the dark? I am not a blind spectator of these sights!

आज उत्तराखंड राज्य को बने हुए 21 साल पूरे हो चुके है 22 वे साल में राज्य ने कदम रखा है।राजनीति के उठापटक माहौल से घिरे उत्तराखंड राज्य में विकास की तमाम नाकाम कोशिशें की गई, लेकिन विकास की राह देखता राज्य आज भी वहीं खड़ा है। वही मुद्दे आज भी ज्वलंत दिखाई देते है जिन्हें साथ लेकर पृथक राज्य के सपने के लिए आंदोलन किया गया था।उत्तराखंड राज्य अब बालिग यानी वयस्क हो चुका है यहां की जनता 21वर्षों का हिसाब सरकार से मांगने में अब भी संकोच कर रही है। 21 साल में ऐसा नही है कि राज्य की तस्वीर ना बदली हो ,बल्कि तस्वीर के साथ साथ शायद राज्य की तकदीर भी सरकारों ने बदल कर रख दी। 9 नवंबर 2000 के बाद से अब तक तकरीबन 35 लाख लोग पलायन कर चुके है सरकारी पलायन आयोग की पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के 1702 गांव वीरान हो चुके है, एक हज़ार गांव ऐसे है जहां सौ से भी कम लोग बचे है। पलायन की मुख्य वजह सपनो के इस उत्तराखंड में रोजगार का ना होना, शिक्षा के लिए बाहर जाना,और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं इत्यादि है। 
जनाब पृथक उत्तराखंड के रहनुमाओं ने सिर्फ ये तस्वीर ही नही बदली बल्कि उत्तराखंड की तकदीर ही बदल डाली ,सत्ता के लोभियों ने उत्तराखंड की आत्मा पर कुठाराघात किया है।उत्तराखंड में अगर स्कूलो की संख्या बढ़ाई जाती,रोजगार के अवसर केवल अखबारों और कागज़ों तक सीमित ना रहते,अखबारों में नौकरी देने वाली सरकारें आपको केवल उत्तराखंड में ही दिखाई देंगी।रोजगार, शिक्षा,और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्थायें की जाती तो पलायन रुक जाता लेकिन पिछली सरकारों ने तो कई स्कूल ही बन्द कर दिए दुरुस्त गांवों में स्कूल तो क्या सड़के तक नही बना पाई सरकारें। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर हर साल ना जाने कितने योजनाओं की घोषणा की जाती है लेकिन अखबारों के पन्नो में हर रोज़ आपको यही खबर दिखाई देगी कि फलाना गांव से कई किमी दूर डोली या कुर्सी से बांध कर मरीज को शहर के अस्पताल लाया गया। जनप्रतिनिधियों से इस बाबत सवाल पूछने पर एक ही रटा रटाया जवाब मिलेगा कि "मामला संज्ञान में नही था हम इस पर उचित कार्यवाही करेंगे"। इसके बाद वो जनप्रतिनिधि आपको देखकर ऐसा नज़रंदाज़ करेगा कि आप माइक लिए लिए उसके आगे पीछे बस घूमते ही रह जाओगे। "मामला संज्ञान में नही था" ये कहते हुए आपको हर अधिकारी, हर नेता,हर जनप्रतिनिधि दिखाई देगा ये सुनकर ऐसा लगता है जैसे ये पद ग्रहण करते समय ये डाइलॉग भी किसी शपथ का कोई हिस्सा हो।ये कहकर शासन प्रशासन अपनी ज़िम्मेदारियों से बड़ी आसानी से पल्ला झाड़ लेते है।
उत्तराखंड राज्य में प्रकृति ने बड़े अनमोल तोहफ़े दिए है लेकिन सरकारी तंत्र उनका भी दोहन करने से बाज नही आती आज उत्तराखंड उस अबला स्त्री की तरह हो गया जो चारो तरफ से भूखे भेड़ियों से घिरी है और हर कोई उसे नोच देना चाहता है।प्राकृतिक संसाधनों की लूट पाट ,खनन माफियाओं द्वारा नदियों का दोहन,भू माफियाओं द्वारा खूबसूरत पहाड़ो को खत्म कर देना ये सब बिना सरकारी तंत्र की अनुमति के कहां सम्भव है।उत्तराखंड के विकास की इमारत सत्ता में बैठे लोभी हर साल फ़ाइलो में बन्द कर देते है।उत्तराखंड की सरकार के वादों का केवल फाइलों में बन्द हो जाना आज अदम गोंडवी के लिखे हुए को याद दिलाता है "तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है मगर ये आंकड़े झूठे है ये दावा किताबी है "
उत्तराखंड की किस्मत कब बदलेंगी कब सत्ता के लोभी नही बल्कि उत्तराखंड का विकास चाहने वाले सरकार चलाएंगे ये सिर्फ एक सपना ही प्रतीत हो रहा है,उत्तराखंड में इतने मुख्यमंत्री बदले गए कि कौन बनेगा करोड़पति तक मे इस साल ये सवाल पूछा गया कि कौन से राज्य में इस वर्ष तीन मुख्यमंत्री बदले गए? अब आप खुद सोचिये जिस राज्य में राज्य की बागडोर संभालने वाले ही बदलते रहे तो क्या विकास होगा? जितने सीएम बदले भी गए उनमें से कितने ईमानदार थे? और यदि ईमानदार थे तो 5 साल का कार्यकाल क्यो नही पूरा कर पाए? एक ईमानदार सीएम अगर वक्त निकलने के बाद आया भी तो तो क्या आया तब तक उत्तराखंड की हालत और बदतर हो जाएगी। यू कह लीजिए कि "तड़प कर बूंद भर पानी को प्यासा(उत्तराखंड) मर गया,घटा घनघोर उसकी लाश पर बरसी तो क्या बरसी"?