उत्तराखंड पोलखोल:आरटीआई से खुला कांग्रेस और बीजेपी की झूठी घोषणाओं का पिटारा वोट मांगने आये तो पूछियेगा जरूर

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तक अगर ये पूछा जाए कि यहां सत्ता की कुर्सी पर बैठी सरकारों ने कितनी घोषणाएं की और कितनी घोषणाओं की अमलीजामा पहनाया गया तो यकीन मानिए घोषणाएं अगर पहाड़ की तरह बड़ी बड़ी की गई तो उन्हें पूरा राई के बराबर ही किया गया। ये खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत गोनिया को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में हुआ है। उत्तराखंड में बीते दस वर्षों में अब तक कुल 9245 घोषणाएं की गई और इनमें से पूरी केवल 18 घोषणाएं ही हो पाई है। कई घोषणाएं शासन स्तर पर ही लंबित है।कई तो शुरू भी नही हुई लेकिन कागजी तौर पर शुरू हो चुकी है। 
हल्द्वानी निवासी हेमंत गोनिया ने आरटीआई के तहत अब तक कुल घोषणाओं का ब्यौरा मांगा था जिसमे खुलासा हुआ कि बीते दस सालों में 9245 घोषणाओं में से 18 घोषणाएं पूरी हुई 5073 घोषणाओं के शासनादेश हो पाए,2817 घोषणाएं शासन स्तर पर लंबित है,1337 घोषणाएं धरातल पर अधूरी है। इन घोषणाओं में सबसे ज्यादा लोक निर्माण विभाग से सम्बंधित है। लोक निर्माण विभाग से जुड़ी 2869 घोषणाओं में से मात्र 4 ही पूरी हो पाई है।

आइये अब एक नज़र डालते है इन दस सालों में कौन कौन मुख्यमंत्री उत्तराखंड में रहे जिन्होंने घोषणाएं तो की लेकिन उन्हें पूरा करने में फेल साबित हुए।
पिछले दस सालो में उत्तराखंड में सात मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठे,इनमें डॉ रमेश पोखरियाल निशंक, बीसी खंडूरी,विजय बहुगुणा, हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी शामिल है। इन मुख्यमंत्रियों पर गौर करे तो बीजेपी के ज़्यादा और कांग्रेस के कम मुख्यमंत्री रहे।
आगामी विधानसभा चुनाव में इस बार फिर बीजेपी और कांग्रेस आमने सामने है,लेकिन सवाल वही खड़ा है इन दोनों दलों ने उत्तराखंड का कितना विकास किया? घोषणाएं की गई तो उन्हें पूरा क्यो नही किया गया? घोषणाओं के लिए बजट भी पारित किया गया,फिर घोषणाएं अधूरी क्यों?