उत्तराखण्डः 12 साल बाद मां नंदा की बड़ी जात यात्रा शुरू! सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोली, ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंजा पूरा क्षेत्र
चमोली। हिमालय महाकुंभ के रूप में प्रसिद्ध मां नंदा की बड़ी जात यात्रा आज शनिवार, पांच सितंबर को धार्मिक आस्था और उत्साह के बीच सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हो गई। मां नंदा की डोली के यात्रा पर निकलते ही पूरा कुरुड़ क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठा। डोली के दर्शन और मां नंदा का आशीर्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुरुड़ पहुंचे और यात्रा में शामिल हुए। चारों ओर पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की गूंज और जयकारों से माहौल पूरी तरह भक्तिमय नजर आया। सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिवसीय विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने के बाद शनिवार को डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया। विदाई के दौरान श्रद्धालुओं में गहरी भावनात्मकता दिखाई दी। मां की डोली के प्रस्थान के समय कई भक्तों की आंखें नम हो गईं। श्रद्धालुओं ने डोली के दर्शन कर मां नंदा से यात्रा के सफल और निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना की। मान्यता और परंपरा के अनुसार मां नंदा को बेटी के रूप में विदा किया जाता है। यात्रा को मां नंदा के मायके से उनके ससुराल कैलाश की ओर प्रस्थान से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि यात्रा के दौरान धार्मिक आस्था के साथ भावनाओं का भी विशेष महत्व रहता है।
करीब 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा
मां नंदा की बड़ी जात यात्रा को दुनिया की सबसे लंबी धार्मिक पैदल यात्राओं में शामिल किया जाता है। यह यात्रा करीब 280 किलोमीटर लंबी है। सामान्य लोकजात यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए वेदनी कुंड तक पहुंचती है, लेकिन इस बार बड़ी जात यात्रा के तहत डोली को आगे होमकुंड तक ले जाया जाएगा। कुरुड़ से रवाना होने के बाद मां नंदा की डोली निर्धारित पड़ावों से होकर हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़ेगी। रास्ते में आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से डोली का स्वागत करेंगे। जगह-जगह पूजा-अर्चना की जाएगी और मां नंदा से क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की जाएगी।
गांव-गांव में होगा डोली का स्वागत
बड़ी जात यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली जिन गांवों और पड़ावों से होकर गुजरेगी, वहां श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिलेगा। ग्रामीण पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां की डोली का स्वागत करेंगे। ढोल-नगाड़ों और मां नंदा के जयकारों के बीच धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना का सिलसिला जारी रहेगा। यात्रा के आगे बढ़ने के साथ श्रद्धालुओं का कारवां भी हिमालय की ओर बढ़ता जाएगा। अंतिम चरण में मां नंदा की डोली होमकुंड पहुंचेगी, जहां विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाएंगे।
12 साल बाद आयोजित हो रही बड़ी जात को लेकर उत्साह
मां नंदा की बड़ी जात यात्रा 12 वर्ष बाद आयोजित हो रही है। ऐसे में चमोली के साथ ही उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु इस ऐतिहासिक धार्मिक यात्रा में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं। यात्रा को लेकर लोगों में विशेष उत्साह और श्रद्धा का माहौल है। कुरुड़ से लेकर यात्रा के विभिन्न पड़ावों तक मां नंदा के जयकारे और पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई दे रही है। बड़ी जात यात्रा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक परंपरा, संस्कृति और हिमालयी जीवन से गहराई से जुड़ी परंपरा भी मानी जाती है। यात्रा के दौरान स्थानीय रीति-रिवाजों और पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं की झलक देखने को मिलती है। बड़ी जात यात्रा का मुख्य धार्मिक अनुष्ठान 30 सितंबर को होमकुंड में प्रस्तावित है। यहां मां नंदा की डोली पहुंचने के बाद विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और धार्मिक प्रक्रियाएं संपन्न की जाएंगी। इसी के साथ बड़ी जात यात्रा का समापन होगा। मां नंदा की बड़ी जात यात्रा उत्तराखंड की धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक संस्कृति की जीवंत पहचान भी है। हिमालयी क्षेत्र में सदियों से चली आ रही इस परंपरा में श्रद्धालु मां नंदा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए कठिन पैदल यात्रा में सहभागी बनते हैं। 12 वर्ष बाद आयोजित हो रही बड़ी जात यात्रा को लेकर इस बार श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है और यात्रा के आगे बढ़ने के साथ इसका धार्मिक और सांस्कृतिक रंग और गहराता जाएगा।