उत्तराखंड:IMPCL की निजी हाथों में बिक्री!क्या सरकार अब उद्योग चलाने नहीं, बेचने के लिए रह गई है?बड़ा सवाल लाभ में थी फैक्टरी, फिर क्यों बेच दी सरकार ने?

Uttarakhand: IMPCL Sold Off to Private Hands! Has the Government Now Been Reduced to Selling Industries Rather Than Running Them? The Big Question: The Factory Was Profitable—So Why Did the Governmen

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के मोहान में स्थित IMPCL (इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड) की रणनीतिक बिक्री केवल एक सरकारी दवा फैक्टरी का निजीकरण नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है जिसमें सरकार धीरे-धीरे सार्वजनिक संपत्तियों से अपना हाथ खींचती जा रही है और उन्हें निजी हाथों में सौंपने को ही विकास का पर्याय मान रही है।

सवाल यह नहीं है कि निजीकरण अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि आखिर एक ऐसी संस्था, जो वर्षों से आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के क्षेत्र में देश की पहचान रही हो, जो स्थानीय लोगों को रोजगार दे रही हो और जिसके बारे में कर्मचारी दावा कर रहे हों कि वह लगातार लाभ में चल रही थी, उसे बेचने की इतनी जल्दी क्यों थी?

सरकार अक्सर घाटे में चल रहे उपक्रमों को निजीकरण का तर्क देकर बेचने की बात करती है। लेकिन यदि कोई संस्थान करोड़ों का कारोबार कर रहा हो, रोजगार दे रहा हो और उसके पास स्वयं करोड़ों की संपत्तियां, एफडी तथा बकाया राशि मौजूद हो, तब उसे बेचने के पीछे का आर्थिक तर्क आम जनता की समझ से परे दिखाई देता है।

यहां चिंता केवल 121 करोड़ रुपये के सौदे की नहीं है। चिंता उस सोच की है जिसमें सरकारी संस्थानों को "राष्ट्र की संपत्ति" नहीं बल्कि "बेचने योग्य संपत्ति" मान लिया गया है। आज आईएमपीसीएल बिकी है, कल कोई और सार्वजनिक इकाई बिकेगी। धीरे-धीरे सरकार की भूमिका संचालक से घटकर केवल नियामक तक सीमित होती जा रही है।

सबसे बड़ा प्रश्न उन 500 से अधिक परिवारों का है जिनकी आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस फैक्टरी से जुड़ी रही है। स्थायी कर्मचारियों को भले एक वर्ष की राहत मिल गई हो, लेकिन सैकड़ों अस्थायी कर्मचारियों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। निजी कंपनियां स्वाभाविक रूप से लाभ कमाने के लिए काम करती हैं, सामाजिक दायित्व निभाने के लिए नहीं। ऐसे में लागत कम करने का पहला रास्ता अक्सर कर्मचारियों की संख्या घटाने से होकर गुजरता है।

देश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह धारणा भी मजबूत हुई है कि बड़े उद्योग समूहों के प्रति सरकार का रवैया असाधारण रूप से उदार रहा है। चाहे बंदरगाह हों, हवाई अड्डे हों, ऊर्जा परियोजनाएं हों या अन्य रणनीतिक क्षेत्र बार-बार यह आरोप उठता रहा है कि राष्ट्रीय संपत्तियां कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के प्रभाव क्षेत्र में सिमटती जा रही हैं। सरकार इन आरोपों को राजनीतिक बताकर खारिज करती रही है, लेकिन जब एक के बाद एक सार्वजनिक संस्थान निजी हाथों में जाते हैं तो संदेह के लिए जमीन भी खुद सरकार ही तैयार करती है।

आईएमपीसीएल के मामले में भी कर्मचारियों ने सवाल उठाया है कि यदि कंपनी के पास दर्जनों करोड़ रुपये की एफडी और अन्य देय राशि मौजूद है तो वास्तविक मूल्यांकन क्या था? क्या बिक्री प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी? क्या स्थानीय समुदाय, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों की चिंताओं को गंभीरता से सुना गया? लोकतंत्र में ऐसे सवाल पूछना न केवल अधिकार है बल्कि आवश्यकता भी है।

विडंबना यह है कि एक तरफ सरकार आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर इसी क्षेत्र की एक प्रमुख सरकारी इकाई को निजी हाथों में सौंप दिया जाता है। यह विरोधाभास नीति और नीयत दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

निजीकरण का समर्थक वर्ग कहेगा कि इससे दक्षता बढ़ेगी, निवेश आएगा और संस्थान बेहतर तरीके से चलेंगे। संभव है ऐसा हो भी। लेकिन विकास का पैमाना केवल बैलेंस शीट नहीं हो सकता। किसी संस्थान का मूल्य उसके मुनाफे से कहीं अधिक उसके सामाजिक योगदान, रोजगार सृजन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका से भी तय होता है।

आईएमपीसीएल की बिक्री इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यह एक फैक्टरी की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की विरासत धीरे-धीरे निजी स्वामित्व में बदलती जा रही है। सरकार को यह समझना होगा कि देश केवल कॉरपोरेट बैलेंस शीट से नहीं चलता; देश उन लाखों परिवारों से चलता है जिनकी रोटी, रोजगार और भविष्य ऐसे संस्थानों से जुड़ा होता है।

यदि हर लाभकारी सार्वजनिक संपत्ति भी अंततः बिकनी है, तो फिर यह प्रश्न पूछना स्वाभाविक है कि सरकार उद्योग चला रही है या सिर्फ उन्हें बेचने की तैयारी कर रही है। यही प्रश्न आज मोहान की पहाड़ियों से उठ रहा है, और शायद आने वाले समय में देश के दूसरे हिस्सों से भी उठेगा।