उत्तराखण्डः लोकायुक्त नियुक्ति में देरी पर हाईकोर्ट में सुनवाई! सरकार बोली- नियम बनाए जा रहे हैं, कोर्ट ने 2 सप्ताह में मांगी प्रगति रिपोर्ट

Uttarakhand: High Court hears case on delay in Lokayukta appointment! Government states rules are being framed; Court seeks progress report within two weeks.

नैनीताल। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में गौलापार निवासी रवि शंकर जोशी द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। आज हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट को अवगत कराया गया कि लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए निर्धारित नियम ;च्तमेबतपइमक त्नसमेद्ध बनाए जाने हैं। जिसके बाद सर्च कमेटी को भेजा जाएगा, जो लोकायुक्त व सदस्यों का चयन करेगी। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार से 2 सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने 2 सप्ताह बाद की तिथि नियत की है। बता दें कि हल्द्वानी निवासी रवि शंकर जोशी ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार ने अभी तक लोकायुक्त की नियुक्ति नही की है। जबकि संस्थान के नाम पर वार्षिक 2 से 3 करोड़ रुपए खर्च हो रहा है। जनहित याचिका में कहा गया है कि कर्नाटक व मध्य प्रदेश में लोकायुक्त द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जा रही है, परंतु उत्तराखंड में तमाम घोटाले हो रहे हैं। हर एक छोटे से छोटा मामला उच्च न्यायालय में लाना पड़ रहा है। जनहित याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान में राज्य की सभी जांच एजेंसी सरकार के अधीन है, जिसका पूरा नियंत्रण राज्य के राजनैतिक नेतृत्व के हाथों में है। वर्तमान में उत्तराखंड राज्य में कोई भी ऐसी जांच एजेंसी नही है जिसके पास यह अधिकार हो की वह बिना शासन की पूर्वानुमति के, किसी भी राजपत्रित अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार का मुकदमा पंजिकृत कर सके। स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के नाम पर प्रचारित किया जाने वाला विजिलेंस विभाग भी राज्य पुलिस का ही हिस्सा है, जिसका सम्पूर्ण नियंत्रण पुलिस मुख्यालय, सतर्कता विभाग या मुख्यमंत्री कार्यालय के पास ही रहता है। एक पूरी तरह से पारदर्शी, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच व्यवस्था राज्य के नागरिकों के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। इसलिए रिक्त पड़े लोकायुक्त की नियुक्ति शीघ्र की जाए। जिससे कि राज्य में हो रहे करप्शन पर रोक लग सके। उनके मामलों की सुनवाई लोकायुक्त के वहां होगी और न्यायालयों का कार्यभार में कमी आएगी। जबकि यह पद वर्ष 2013 से खाली पड़ा है।