उत्तराखण्डः 16 करोड़ का पुल और 16 दिन में धंसी एप्रोच रोड! ठेकेदार फर्म में भाजपा कनेक्शन ने गरमाई सियासत, सरकार और जांच एजेंसियों पर टिकी निगाहें

Uttarakhand: A ₹16-crore bridge, yet the approach road caved in within just 16 days! Political temperatures rise over the contractor firm's BJP connections; all eyes are now on the government and inv

देहरादून। राजधानी देहरादून में नंदा की चौकी पुल की एप्रोच रोड धंसने के मामले ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए इस पुल की एप्रोच रोड उद्घाटन के महज 16 दिन बाद ही क्षतिग्रस्त होने से निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला तब और चर्चित हो गया, जब विपक्ष ने निर्माण कार्य से जुड़ी ठेकेदार फर्म के कथित राजनीतिक संबंधों को लेकर सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। कांग्रेस का आरोप है कि जिस फर्म को निर्माण कार्य मिला, उसके एक साझेदार का संबंध भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष रुचि भट्ट के परिवार से है। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। भाजपा की ओर से कहा गया है कि किसी भी निर्माण कार्य में अनियमितता या गुणवत्ता की कमी मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। 

दरअसल, देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र में नंदा की चौकी के पास सितंबर 2025 में पुराना पुल बह गया था। इसके बाद यहां नए पुल के निर्माण, पिलर स्ट्रेंथनिंग, एप्रोच रोड और अन्य संबंधित कार्यों के लिए करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से परियोजना तैयार की गई। नए पुल के उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद 28 जुलाई 2026 को एप्रोच रोड पर अचानक गहरा गड्ढा बनने की घटना सामने आई। इसके बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे। हालांकि, संबंधित विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए करीब 12 घंटे के भीतर एप्रोच रोड को दुरुस्त कर यातायात बहाल कर दिया। विभाग की यह तत्परता निश्चित तौर पर सराहनीय है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किए गए किसी महत्वपूर्ण पुल की एप्रोच रोड इतनी जल्दी क्षतिग्रस्त कैसे हो गई?

विपक्ष का आरोप है कि निर्माण कार्य से जुड़ी फर्म में भाजपा से जुड़े लोगों का पारिवारिक या राजनीतिक कनेक्शन होने के कारण मामले की निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रही है और मांग कर रही है कि पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र और निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए। विपक्ष का सवाल है कि क्या जांच एजेंसियां राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होकर काम करेंगी और यदि निर्माण में खामी पाई जाती है तो क्या जिम्मेदारी तय की जाएगी? 

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता ने रखा सरकार का पक्ष
इधर, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता कुंवर जपेंद्र सिंह ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि घटना के तत्काल बाद यातायात बहाल कराया गया और जांच के आदेश दिए गए हैं। मुख्यमंत्री भी स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही या गड़बड़ी सामने आती है तो दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने विपक्ष के आरोपों पर कहा कि किसी भी व्यक्ति को व्यवसाय करने और निर्माण कार्य में भाग लेने का अधिकार है। यदि किसी परियोजना में गुणवत्ता संबंधी गड़बड़ी या अनियमितता पाई जाती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

क्या निर्माण की गुणवत्ता की पर्याप्त निगरानी हुई थी?
इस मामले में कई सवाल अब भी कायम हैं। क्या 16 करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजना में निर्माण की गुणवत्ता की पर्याप्त निगरानी हुई थी? अगर एप्रोच रोड में तकनीकी खामी थी तो उद्घाटन से पहले निरीक्षण में यह सामने क्यों नहीं आई? क्या निर्माण सामग्री और सड़क की गुणवत्ता की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई गई? क्या ठेकेदार फर्म की राजनीतिक पहुंच के आरोपों को दरकिनार कर जांच निष्पक्ष तरीके से होगी? और सबसे अहम सवाल, अगर जांच में दोष सामने आता है तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी? 

सरकार और जांच एजेंसियों पर टिकी निगाहें
उत्तराखंड में सरकारी निर्माण परियोजनाओं में राजनीतिक प्रभाव और ठेकेदारों के कथित संबंधों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में नंदा की चौकी पुल प्रकरण सरकार के लिए एक परीक्षा बन गया है। जनता के करोड़ों रुपये से तैयार होने वाली परियोजनाओं की गुणवत्ता किसी भी राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव से ऊपर होनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच केवल कागजी कार्रवाई बनकर न रह जाए, बल्कि तकनीकी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार सामने आता है तो दोषी व्यक्ति चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई हो। अब निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों पर हैं कि इस मामले में केवल एप्रोच रोड को दुरुस्त कर जिम्मेदारी पूरी मानी जाएगी या फिर 16 करोड़ रुपये की पूरी परियोजना की गुणवत्ता, निर्माण प्रक्रिया, निगरानी व्यवस्था और ठेकेदार फर्म से जुड़े राजनीतिक कनेक्शन के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होगी।