UGC: सुप्रीम कोर्ट ने फिर से लागू किया 2012 वाला पुराना नियम! लिंक में जानें एक्सपर्ट कमेटी में क्या होगा खास और क्या होगा गाइडलाइंस का भविष्य?
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज गुरूवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के नए नियमों को फिलहाल लागू करने से रोक दिया है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि गाइडलाइंस में अस्पष्टता है। अदालत ने चिंता जताई की गाइडलाइंस का गलत इस्तेमाल हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इन नियमों में कई बातें स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं और इस वजह से इनके गलत इस्तेमाल की संभावना बनी रहती है। बेंच ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इन गाइडलाइंस का मसौदा दोबारा तैयार करे और नियमों को ज्यादा पारदर्शी और सहज बनाए। यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगने के बाद अब एक प्रश्न खड़ा हो गया है कि यूजीसी के नए गाइडलाइंस का क्या होगा? क्या नए नियम अब कभी प्रभावी नहीं हो पाएंगे। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई जाए। इस गाइडलाइंस की भाषा को स्पष्ट की जाए। अदालत ने कहा कि इस मामले में दखल देना ज़रूरी है क्योंकि नई गाइडलाइंस समाज को बांट सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नई गाइडलाइंस का गंभीर असर हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब 2012 में जारी गाइडलाइंस ही काम करेंगे। अब सवाल उठ रहा है कि यूजीसी की नई गाइडलाइंस का क्या होगा? दरअसल अब इस गाइडलाइंस की दिशा 19 मार्च को होने वाली सुनवाई पर तय करेगी। इस दिन सुप्रीम कोर्ट केंद्र और यूजीसी के साथ मिलकर एक कमेटी का गठन कर सकती है। इस नई कमेटी में शिक्षाविद, प्रोफेसर, समाजशास्त्री और समाज के दूसरे वर्गों के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। ये सभी सदस्य मिलकर यूजीसी की गाइडलाइंस की भाषा को स्पष्ट बनाएंगे, ताकि इसका दुरुपयोग नहीं हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार की सुनवाई में कहा कि पीड़ित को बिना किसी उपाय के के नहीं छोड़ा जाना चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने इसी बिंदू पर अपनी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि माफ़ कीजिए, लेकिन नियम पहली नज़र में अस्पष्ट हैं, जिनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। इस्तेमाल की गई भाषा अस्पष्ट है। इसलिए कमेटी को नए गाइडलाइंस की भाषा ऐसी बनानी होगी जो निरापद हो, किसी को आपत्ति नहीं हो, पीड़ित को न्याय दिलाने वाला हो।
क्या थे 2012 के नियम, नए नियमों में क्या बदला था?
दरअसल, 2012 में UGC ने कहा था कि हर विश्वविद्यालय और कॉलेज अपने कैंपस में Equal Opportunity Cell (EOC) बनाए। इसका काम था SC और ST छात्रों की शिकायतें सुनना और कैंपस में समानता का माहौल बनाना.लेकिन यह अनिवार्य नहीं था, सिर्फ सलाह थी। EOC का उद्देश्य था कि भेदभाव की शिकायतें ली जाएं। छात्रों के साथ होने वाली किसी भी तरह की असमानता पर कार्रवाई सुझाई जाए, लेकिन यहां भी एक समस्या थी किस समय में सुनवाई होनी चाहिए, कब तक जांच पूरी होनी चाहिए, इनमें से कुछ भी तय नहीं था। 2012 के नियम कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं थे। मतलब अगर कोई विश्वविद्यालय EOC न बनाए.शिकायतें न सुने, या नियमों को नजरअंदाज कर दे तो UGC कुछ भी कार्रवाई नहीं कर सकता था। न फंडिंग रोक सकते थे। न मान्यता पर असर डाल सकते थे। 2012 की नियमावली में सिर्फ SC और ST को शामिल किया गया था। OBC,EWS,दिव्यांग (PwD) या अन्य सामाजिक समूह का इनका कोई जिक्र नहीं था।
नए ढांचे में सबसे बड़ा बदलाव यही थे। अब हर संस्थान में Equal Opportunity Centre अनिवार्य होगा और उसके अंदर एक Equity Committee बनेगी, जिसे पहले की तुलना में कहीं अधिक शक्ति दी गई है। इसके साथ 24×7 शिकायत तंत्र, ऑनलाइन पोर्टल और सख्त टाइमलाइन को भी अनिवार्य किया गया है। जैसे शिकायत मिलते ही 24 घंटे में बैठक, 15 दिन में जांच रिपोर्ट और सात दिनों के भीतर कार्रवाई। इतना ही नहीं, यदि संस्थान नियम नहीं मानते, तो UGC फंडिंग रोक सकता है, मान्यता प्रभावित कर सकता है और नए कोर्स की मंज़ूरी भी रोक सकता है। यानी 2012 के ढीले-ढाले नियमों की जगह अब 2026 का ढांचा पूरी तरह लागू होने योग्य, दंड से जुड़ा और सख्त हो गया है। लेकिन विवाद यहीं से शुरू होता है। कई विशेषज्ञों और प्रशासकों का कहना है कि पुराने कानून पहले से काफी थे, UGC ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे क्यों असफल हुए। नए नियमों में दुरुपयोग रोकने के लिए कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है-जैसे कि फर्जी शिकायत क्या मानी जाएगी, सबूत का मानक क्या होगा, अपील किस तरह होगी या जांच के दौरान आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा। कठोर दंड के कारण संस्थान अनावश्यक सावधानी बरत सकते हैं, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होने का डर है।