Sep 20, 2026 Login

दिल्ली को बदलने वाले अफसर का खामोश अंतः पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता की कहानी छोड़ गई कई बड़े सवाल! सफलता, परिवार, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक सुकून के मायने पर छिड़ी गंभीर बहस

The quiet exit of the officer who transformed Delhi: The story of former Chief Secretary Rakesh Mehta raises several profound questions! It has sparked a serious debate on the true meaning of success

नई दिल्ली। दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था में चार दशक से ज्यादा समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता ने 74 साल की आयु में विगत 6 सितंबर 2026 को नोएडा के सेक्टर 82 में स्थित अपने आवास पर सुसाइड कर लिया। घटनास्थल से एक सुसाइड नोट मिला है, जिसमें लंबे समय से चली आ रही स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का उल्लेख किया गया है। उनके सुसाइड करने की खबर ने जहां लोगों को स्तब्ध पर कर दिया है, वहीं पद, पैसे के साथ-साथ रिश्तों, संवाद, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक सुकून पर भी बहस छेड़ दी है। 1975 बैच के IAS अधिकारी रहे मेहता ने दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था से लेकर बिजली, परिवहन, नगर निकाय और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों तक कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं। राकेश मेहता 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। उनका अधिकांश प्रशासनिक करियर दिल्ली से जुड़ा रहा। दिल्ली सरकार और नगर निगम में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी संभाली। वे दिल्ली नगर निगम के कमिश्नर रहे, बिजली विभाग में सचिव की भूमिका निभाई और परिवहन विभाग में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। 2007 में उन्हें दिल्ली का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। नवंबर 2010 में सेवानिवृत्ति तक उन्होंने इस पद पर काम किया। इस दौरान दिल्ली में बड़े पैमाने पर आधारभूत ढांचे से जुड़े काम चल रहे थे और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियां प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई थीं। मेहता के प्रशासनिक करियर का बड़ा हिस्सा तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल से जुड़ा रहा। दिल्ली में बिजली, परिवहन, नगर निकाय और शहरी सुविधाओं से जुड़े कई सुधारों के दौर में उन्होंने महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। उनके साथ काम कर चुके अधिकारियों और नेताओं ने उन्हें ऐसे प्रशासक के रूप में याद किया, जो पारंपरिक प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ-साथ बदलावों को लागू करने पर भी जोर देते थे। पूर्व मंत्री अरविंदर सिंह लवली ने भी उनके प्रशासनिक योगदान को याद किया। दिल्ली के बिजली वितरण तंत्र के निजीकरण की प्रक्रिया में राकेश मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बिजली सचिव के रूप में उन्होंने इस बड़े प्रशासनिक बदलाव के दौरान जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा प्रॉपर्टी टैक्स के आकलन के लिए यूनिट एरिया मेथड लागू करने की प्रक्रिया में भी उनका योगदान रहा। पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, इस व्यवस्था का उद्देश्य संपत्ति कर के आकलन को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाना था। दिल्ली के परिवहन क्षेत्र में भी मेहता का कार्यकाल महत्वपूर्ण माना जाता है। उस दौर में ब्लू लाइन बसों को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं लगातार सामने आती थीं। परिवहन विभाग में जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने बस व्यवस्था में बदलाव की प्रक्रिया में भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल में दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन बेड़े में लो-फ्लोर बसों को शामिल करने की दिशा में काम आगे बढ़ा। बाद के वर्षों में ब्लू लाइन बसों को धीरे-धीरे हटाकर नई बस व्यवस्था विकसित की गई। 2007 में दिल्ली के मुख्य सचिव बनने के बाद राकेश मेहता के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौतियों में 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियां भी शामिल थीं। राजधानी में सड़क, परिवहन, बिजली और नागरिक सुविधाओं से जुड़े बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए उस समय बड़े पैमाने पर काम चल रहा था। मुख्य सचिव के रूप में उन्होंने विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और आयोजन से जुड़े प्रशासनिक कार्यों की निगरानी की। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली में हुए व्यापक बुनियादी ढांचे के बदलावों में उनकी प्रशासनिक भूमिका को लंबे समय तक याद किया गया।

रिटायरमेंट के बाद जिंदगी का दूसरा अध्याय...
सरकारी सेवा में रहते हुए जिस अधिकारी के पास बड़ी जिम्मेदारियां थीं, वही जिंदगी का दूसरा अध्याय शुरू होने के बाद एक अलग तरह की चुनौतियों से जूझ रहा था। उनके परिवार के सदस्य अपने-अपने जीवन और काम में व्यस्त थे। मेहता नोएडा में रह रहे थे। उनकी मौत ने उस सवाल को भी सामने रखा जिसे अक्सर सफलता और व्यस्तता के बीच नजरअंदाज कर दिया जाता है, रिटायरमेंट के बाद व्यक्ति अपनी पहचान, सामाजिक जुड़ाव और रोजमर्रा की जिंदगी को किस तरह बनाए रखता है? राकेश मेहता का प्रशासनिक सफर यह दिखाता है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके पद और उपलब्धियों से कितनी गहराई से जुड़ सकती है। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद वही पहचान धीरे-धीरे बदल जाती है। सरकारी दफ्तर, बैठकों का सिलसिला, फैसलों की जिम्मेदारी और रोजाना मिलने वाले सैकड़ों लोगों की जगह एक अपेक्षाकृत शांत जीवन ले लेता है। ऐसे समय में परिवार, दोस्त, पड़ोसी और सामाजिक जुड़ाव की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। कामयाबी केवल पद, प्रतिष्ठा या आर्थिक उपलब्धियों का नाम नहीं है। जीवन में संवाद, अपनापन और साथ भी उतने ही जरूरी हैं।

अकेलेपन पर गंभीरता से बात करने की जरूरत
राकेश मेहता की मौत के बाद सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों के अकेलेपन तथा मानसिक स्वास्थ्य को केवल निजी मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। परिवार में सबके अपने काम और जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन नियमित बातचीत, साथ बैठना और किसी की बात ध्यान से सुन लेना कई बार बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यह घटना उन परिवारों के लिए भी एक सबक है, जहां माता-पिता की आर्थिक जरूरतें पूरी होने के बावजूद उनका सामाजिक और भावनात्मक जीवन धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है।

उपलब्धियों से भरी जिंदगी, लेकिन अंतिम दौर ने छोड़ा सवाल
राकेश मेहता का नाम दिल्ली के प्रशासनिक इतिहास के उन अधिकारियों में लिया जाता है जिन्होंने बिजली, परिवहन, नगर प्रशासन और कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जिम्मेदारी निभाई। उनका चार दशक से अधिक लंबा प्रशासनिक सफर उपलब्धियों से भरा रहा। लेकिन उनके जीवन का अंतिम अध्याय एक गंभीर सवाल छोड़ गया है, क्या हम अपने जीवन की दौड़ में उस समय के लिए भी तैयारी करते हैं, जब पद, व्यस्तता और जिम्मेदारियां हमारे पास नहीं रहेंगी? शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संदेश है। करियर जरूरी है, सफलता जरूरी है, परिवार का भविष्य जरूरी है, लेकिन इनके साथ अपने लिए रिश्ते, संवाद, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक सुकून की जगह बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि जिंदगी की असली कीमत केवल यह नहीं कि हमने कितनी बड़ी कुर्सी हासिल की, बल्कि यह भी है कि उस कुर्सी से उतरने के बाद हमारे आसपास कितने अपने लोग मौजूद हैं।