Sep 18, 2026 Login

निठारी कांडः लड़कियों की लाशों से शुरू हुई कहानी! गिरफ्तारी और फांसी की सजा से बरी होने तक पहुंची! हरिद्वार में सुरेन्द्र कोली की खुदकुशी के साथ दफन हुए कई अनसुलझे राज

The Nithari Case: A story that began with the bodies of girls! It spanned everything from arrests to an acquittal that overturned a death sentence! Many unsolved secrets were buried along with Surend

हरिद्वार। देश को झकझोर देने वाले बहुचर्चित निठारी कांड के मुख्य आरोपी रहे अल्मोड़ा निवासी सुरेंद्र कोली ने हरिद्वार में खुदकुशी कर ली। करीब दो दशक पहले निठारी कांड में हत्या, बलात्कार, अपहरण और शवों को ठिकाने लगाने जैसे गंभीर आरोपों के चलते सुर्खियों में आए सुरेंद्र कोली को अलग-अलग मामलों में अदालतों ने दोषी ठहराया था और कई मामलों में मौत की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, बाद में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अभियोजन के साक्ष्यों और जांच पर गंभीर सवाल उठे। वर्ष 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट और वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद निठारी से जुड़े सभी मामलों में कोली की दोषसिद्धियां समाप्त हो गईं और वह कानूनी रूप से बरी हो गया था। निठारी कांड की शुरुआत वर्ष 2005 के आसपास नोएडा के निठारी इलाके से जुड़ी महिलाओं और बच्चों की गुमशुदगी की शिकायतों से हुई थी। निठारी गांव नोएडा के सेक्टर-31 से सटा हुआ है। इसी इलाके में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर का D-5 मकान था, जहां सुरेंद्र कोली घरेलू सहायक के रूप में काम करता था। बाद में D-5 के आसपास के खुले हिस्से और नाले से मानव अवशेष, हड्डियां, खोपड़ियां, कपड़े और जूते बरामद होने के बाद यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बन गया।

गुमशुदगियों से खुला भयावह मामला
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार मोनिंदर सिंह पंढेर ने फरवरी 2004 में D-5 बंगला खरीदा था और जुलाई 2004 में सुरेंद्र कोली वहां घरेलू सहायक के तौर पर काम करने लगा। वर्ष 2005 की शुरुआत से निठारी में महिलाओं और बच्चों के गायब होने की शिकायतें सामने आने लगी थीं। मार्च 2005 में आसपास खेल रहे बच्चों ने D-5 और D-6 के बीच खुले हिस्से में एक मानव हाथ देखे जाने की बात भी बाद की न्यायिक कार्यवाही में सामने आई। 7 मई 2006 को एक लड़की के लापता होने के बाद उसके पिता नंदलाल ने पुलिस में शिकायत की। आरोप है कि तत्काल FIR दर्ज नहीं हुई। इसके बाद 24 अगस्त 2006 को उन्होंने CrPC की धारा 156(3) के तहत अदालत का रुख किया। 27 सितंबर 2006 को CJM, गौतमबुद्ध नगर ने FIR दर्ज करने का आदेश दिया और 7 अक्टूबर 2006 को सेक्टर-20 थाना, नोएडा में केस क्राइम नंबर 838/2006 के तहत FIR दर्ज हुई।

29 दिसंबर 2006 को सामने आया निठारी का सच
निठारी कांड में निर्णायक मोड़ 29 दिसंबर 2006 को आया। पुलिस सुरेंद्र कोली को गुमशुदगी के मामले में हिरासत में लेकर D-5 पहुंची। उसी दिन मोनिंदर सिंह पंढेर को भी मकान के बाहर से हिरासत में लिया गया। D-5, D-6 और जल बोर्ड की जमीन के बीच खुले हिस्से में खुदाई के दौरान खोपड़ियां, हड्डियां, जूते और कपड़े मिलने लगे। इससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया और देखते ही देखते मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया। 30 दिसंबर को अलग-अलग लापता लोगों के संबंध में कई FIR दर्ज की गईं। 31 दिसंबर को D-1 से D-6 के सामने बने कवर किए गए स्टॉर्म-वॉटर ड्रेन से भी मानव अवशेष और अन्य सामान मिलने की बात रिकॉर्ड में दर्ज हुई। बड़ी संख्या में पीड़ित परिवार निठारी पहुंचे और अपने लापता परिजनों के फोटो तथा कपड़ों के आधार पर पहचान कराने की कोशिश करने लगे। मीडिया में D-5 को बाद में 'हाउस ऑफ हॉरर' कहा जाने लगा।

क्या थी सुरेंद्र कोली के खिलाफ अभियोजन की कहानी?
पुलिस और बाद में CBI की अभियोजन कहानी के अनुसार कोली पीड़ितों को बहाने से D-5 में लाता था। आरोप था कि वहां उनके साथ यौन हिंसा की जाती और हत्या के बाद शवों को काटकर उनके हिस्से पीछे के खुले क्षेत्र और नाले में फेंक दिए जाते थे। अभियोजन ने कोली के कथित खुलासे के आधार पर कुछ बरामदगियों का भी दावा किया। हालांकि, बाद की न्यायिक प्रक्रिया में इन साक्ष्यों की वैधानिकता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विशेष रूप से उस जगह को लेकर सवाल उठाया जहां से खोपड़ियां और हड्डियां मिली थीं। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार वह D-5 की चारदीवारी के भीतर का निजी स्थान नहीं बल्कि D-5 और D-6 के बीच का खुला क्षेत्र था। अदालत ने यह भी नोट किया कि पुलिस के पहुंचने से पहले वहां खुदाई शुरू हो चुकी थी। ऐसे में आरोपी के कथित खुलासे के आधार पर हुई बरामदगी को किस हद तक विश्वसनीय माना जाए, यह महत्वपूर्ण कानूनी सवाल बना। निठारी मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 जनवरी 2007 को जांच CBI को सौंप दी और 11 जनवरी को CBI ने औपचारिक रूप से जांच संभाली। इसके बाद D-5 और आसपास के इलाकों की जांच में AIIMS, CFSL और FSL जैसी एजेंसियों की मदद ली गई। CBI ने पुराने FIR दोबारा दर्ज कर मामलों को अलग-अलग केस के तौर पर आगे बढ़ाया। DNA जांच के जरिए बरामद मानव अवशेषों को लापता लोगों के परिवारों से जोड़ने की कोशिश हुई। लेकिन बाद में अदालत ने DNA से किसी अवशेष की पहचान होने और उस व्यक्ति की हत्या D-5 में सुरेंद्र कोली द्वारा किए जाने के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना। यानी किसी अवशेष की पहचान अपने आप में हत्या के स्थान और आरोपी की भूमिका को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी गई।

कबूलनामे पर भी उठे सवाल
13 जनवरी 2007 को CBI के अनुसार कोली ने D-5 और आसपास हत्या तथा शवों को ठिकाने लगाने से संबंधित जानकारी दी, जिसके आधार पर कुछ बरामदगी होने का दावा किया गया। इसके बाद 1 मार्च 2007 को मजिस्ट्रेट के सामने CrPC की धारा 164 के तहत उसका कथित कबूलनामा रिकॉर्ड हुआ। ट्रायल कोर्ट ने इसे स्वैच्छिक और विश्वसनीय माना था। लेकिन बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कबूलनामे की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। अदालत के अनुसार कोली करीब 60 दिनों तक लगातार पुलिस हिरासत में रहा था। उसे प्रभावी और निजी कानूनी सहायता मिलने को लेकर भी सवाल उठे। रिकॉर्ड में टॉर्चर के आरोपों से संबंधित संदर्भ भी सामने आए। कबूलनामा रिकॉर्ड किए जाने की प्रक्रिया में जांच अधिकारी की मौजूदगी या निकटता को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना।

16 मामलों में चार्जशीट, कई मामलों में मौत की सजा
CBI ने कुल 19 FIR में से 16 मामलों में चार्जशीट दाखिल की और इन्हीं मामलों में मुकदमे आगे चले। 13 फरवरी 2009 को गाजियाबाद की विशेष CBI अदालत ने 14 वर्षीय रिम्पा हलदर की हत्या, अपहरण, बलात्कार और सबूत मिटाने के आरोपों में सुरेंद्र कोली को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। 11 सितंबर 2009 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिम्पा हलदर मामले में कोली की दोषसिद्धि और मौत की सजा बरकरार रखी, जबकि मोनिंदर सिंह पंढेर को पर्याप्त प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया। 15 फरवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी रिम्पा हलदर मामले में कोली की दोषसिद्धि और मौत की सजा बरकरार रखी। हालांकि 28 अक्टूबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी, लेकिन बाद में मौत की सजा के क्रियान्वयन में हुई देरी के आधार पर 28 जनवरी 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। दोषसिद्धि उस समय समाप्त नहीं हुई थी।

2023 में बदल गई पूरी कानूनी तस्वीर
रिम्पा हलदर मामले के अलावा 2010 से 2021 के बीच निठारी से जुड़े 12 अन्य मामलों में भी कोली को दोषी ठहराया गया। कई मामलों में उसे मौत की सजा मिली। एक समय उसके खिलाफ 13 मौत की सजाएं थीं। लेकिन 16 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मामलों में उसे बरी कर दिया। इसी दौरान मोनिंदर सिंह पंढेर को भी उसके खिलाफ लंबित दो मामलों में बरी किया गया। हाईकोर्ट ने जांच और अभियोजन के कई पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए। इनमें कथित कबूलनामे की स्वैच्छिकता, लंबे पुलिस हिरासत काल, कानूनी सहायता, बरामदगी की वैधता, D-5 के भीतर हत्या के दावे के समर्थन में फॉरेंसिक साक्ष्य और हथियारों का वैज्ञानिक संबंध प्रमुख थे। अदालत के अनुसार अभियोजन इन सवालों का भरोसेमंद जवाब नहीं दे सका। D-5 की फॉरेंसिक जांच को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल सामने आए। हाईकोर्ट के अनुसार वहां कई हत्याओं और शवों के टुकड़े किए जाने के अनुरूप मानव खून या अन्य निर्णायक जैविक साक्ष्य नहीं मिला। चाकू और कुल्हाड़ी की बरामदगी का दावा सामने आया, लेकिन अदालत के मुताबिक उन पर ऐसा वैज्ञानिक संबंध स्थापित नहीं हुआ जिससे यह साबित हो कि इन्हीं हथियारों से हत्या या शव काटे गए थे।

30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा बरी होने का फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ CBI और कुछ पीड़ित परिवारों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने 14 अपीलें खारिज कर हाईकोर्ट के बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद कोली 12 मामलों में कानूनी रूप से बरी हो चुका था। हालांकि वह रिम्पा हलदर मामले में 2015 में बदली गई उम्रकैद की सजा के कारण जेल में था। इसके बाद कोली ने सुप्रीम कोर्ट में उपचारात्मक याचिका दाखिल की। उसका तर्क था कि जिन साक्ष्यों और कथित बरामदगियों के आधार पर अन्य 12 मामलों में उसे बरी किया जा चुका है, उसी तरह के साक्ष्यों के आधार पर रिम्पा हलदर मामले में उसकी दोषसिद्धि कायम नहीं रहनी चाहिए। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी उपचारात्मक याचिका स्वीकार कर ली और रिम्पा हलदर मामले में भी उसे बरी कर दिया। उसकी दोषसिद्धि, सजा और जुर्माने समाप्त कर दिए गए तथा किसी अन्य मामले में जरूरत न होने पर तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।

12 नवंबर 2025 को जेल से बाहर आया था कोली, सबसे बड़ा सवाल आज भी अनसुलझा
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 12 नवंबर 2025 को सुरेंद्र कोली जेल से बाहर आ गया। इसके साथ निठारी कांड में उसके खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक मामलों में उसकी दोषसिद्धियां समाप्त हो गईं। यानी जिस व्यक्ति को कभी निठारी कांड का मुख्य आरोपी माना गया था, वह अपनी जिंदगी के अंतिम दौर में कानूनी रूप से सभी मामलों में बरी हो चुका था। निठारी कांड की पूरी न्यायिक यात्रा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रह गया कि आखिर उन हत्याओं के लिए जिम्मेदार कौन था? उपलब्ध कानूनी स्थिति में इसका कोई न्यायिक रूप से स्थापित जवाब नहीं है। 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी यह स्पष्ट हुआ कि लंबे समय की जांच के बावजूद वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुसार स्थापित नहीं हो सकी। अदालत ने यह भी माना कि गंभीर संदेह पुख्ता सबूत का विकल्प नहीं हो सकता। निठारी कांड इसलिए भी महत्वपूर्ण बना रहेगा क्योंकि इसमें एक तरफ देश को झकझोर देने वाली गुमशुदगियां और मानव अवशेषों की बरामदगी हुई, दूसरी तरफ लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अभियोजन के प्रमुख साक्ष्यों पर सवाल खड़े हुए। सुरेंद्र कोली को अलग-अलग अदालतों ने दोषी ठहराया, मौत की सजाएं दीं और बाद में उसकी सजा उम्रकैद में बदली गई। फिर 2023 और 2025 के फैसलों में उन दोषसिद्धियों का कानूनी आधार टिक नहीं सका। अब कोली की मौत के साथ निठारी कांड से जुड़ी उस लंबी कहानी का एक और अध्याय समाप्त हो गया है, लेकिन गुमशुदगियों, शुरुआती जांच, बरामदगी, फॉरेंसिक साक्ष्यों और वास्तविक अपराधी की पहचान से जुड़े सवाल आज भी पूरी तरह अनुत्तरित हैं।