नैनीताल: स्मृतियों में 18 सितंबर 1880 !जब भूस्खलन से नैनीताल में पहाड़ टूटकर झील में समा गया,151 लोगों की गई थी जान! बदल गई थी नैनीताल की भूगोलीय संरचना,मानवीय जिद के कारण आज भी खतरे की जद में है नैनीताल
नैनीताल।
नैनीताल के इतिहास में 18 सितंबर एक ऐसी तारीख है, जिसे आज भी शहर की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में याद किया जाता है। ठीक 146 वर्ष पहले, 18 सितंबर 1880 को नैनीताल में ऐसा विनाशकारी भूस्खलन हुआ था, जिसने कुछ ही मिनटों में शहर का भूगोल बदल दिया। इस त्रासदी में 151 लोगों की मौत हुई थी।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) के दस्तावेज के अनुसार, यह भूस्खलन शनिवार, 18 सितंबर 1880 की सुबह भारी बारिश के बीच शुरू हुआ था। बारिश 16 सितंबर से लगातार हो रही थी और 18 सितंबर तक हालात बेहद गंभीर हो चुके थे। 17 और 18 सितंबर को ही करीब 838 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। भारी बारिश के साथ क्षेत्र में भूकंपीय झटके की भी बात ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है।

भूस्खलन नैनीताल के उत्तरी हिस्से में शेर का डांडा क्षेत्र की पहाड़ी से हुआ। पहाड़ का एक विशाल हिस्सा अचानक नीचे की ओर खिसक पड़ा। मलबे, चट्टानों और पेड़ों का सैलाब तेजी से झील की ओर आया और रास्ते में आने वाली इमारतों को अपनी चपेट में लेता चला गया।
उस समय क्षेत्र में विक्टोरिया होटल, असेंबली रूम्स, बेल्स की दुकान और नैना देवी मंदिर सहित कई महत्वपूर्ण इमारतें थीं। भूस्खलन का मलबा झील में भी जा गिरा और झील का एक हिस्सा भर गया। बाद में इसी भरे हुए क्षेत्र ने वर्तमान फ्लैट्स के निर्माण का आधार तैयार किया। हादसा इतना अचानक और तेज था कि इसकी चपेट में आने वाले लोगों को संभलने तक का अवसर नहीं मिला। NIDM के दस्तावेज में इस आपदा में 151 लोगों के मारे जाने का उल्लेख है, जिनमें 43 यूरोपीय और यूरेशियन शामिल थे।
बारिश ने बनाया पहाड़ को ‘सेमी-फ्लूड’ मलबा
17 और 18 सितंबर को हुई अत्यधिक बारिश ने पहाड़ी की मिट्टी और चट्टानों को बेहद अस्थिर कर दिया था। लगातार पानी से पूरी ढलान ऐसी स्थिति में पहुंच गई थी, जहां उसे खिसकने के लिए बहुत कम अतिरिक्त दबाव की जरूरत थी।ऐतिहासिक भूगर्भीय अध्ययन इस घटना में भारी बारिश के साथ एक हल्के भूकंपीय झटके को भी संभावित ट्रिगर के तौर पर दर्ज करते हैं।
1880 की त्रासदी के बाद तत्कालीन प्रशासन ने भविष्य में ऐसी आपदा को रोकने के लिए शहर की जल निकासी और निर्माण व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। वर्षाजल की निकासी के लिए बड़ी संख्या में नालों का निर्माण कराया गया और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण से जुड़े नियम कड़े किए गए। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में 62 नालों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। 1880 की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि नैनीताल जैसे पहाड़ी और भूस्खलन-संवेदनशील शहर में प्राकृतिक ढलानों, जल निकासी और निर्माण गतिविधियों के बीच संतुलन कितना जरूरी है।
18 सितंबर 1880 की त्रासदी सिर्फ इतिहास का एक पन्ना नहीं है। यह नैनीताल की भौगोलिक संवेदनशीलता की एक बड़ी ऐतिहासिक चेतावनी भी है। जिस पहाड़ी ने 1880 में अपना एक बड़ा हिस्सा खोया था, उस घटना के बाद शहर में जल निकासी, निर्माण नियंत्रण और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी को लेकर कई व्यवस्थाएं विकसित की गईं।
146 साल बाद भी नैनीताल के लिए 18 सितंबर की त्रासदी महज इतिहास नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। सरकारी दस्तावेजों और उपलब्ध भू-स्खलन अध्ययनों में नैनीताल की पहाड़ियों को संवेदनशील और भूस्खलन-प्रवण बताया गया है। 1880 की तबाही के बाद जिस पहाड़ी पर निर्माण, खुदाई और ढलानों से छेड़छाड़ तक रोकने की सिफारिश की गई थी, उसी शहर में बाद के दशकों में तेजी से बढ़ा अनियंत्रित और बहुमंजिला निर्माण आज चिंता का विषय बना हुआ है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के दस्तावेज में भी नैनीताल में बढ़ती निर्माण गतिविधियों, पहाड़ी ढलानों पर दबाव और पुराने ड्रेनेज सिस्टम के प्रभावित होने का उल्लेख है। वहीं, अनधिकृत और भारी निर्माण से जुड़े आरोपों को लेकर न्यायिक मंचों पर भी मामले पहुंचे हैं। ऐसे में नैनीताल को विकास के नाम पर कंक्रीट के बढ़ते बोझ से बचाना अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि शहर की सुरक्षा और भविष्य का सवाल है। 1880 की तबाही ने जो सबक दिया था, उसे नजरअंदाज करना आने वाले समय में पहाड़, झील और आबादी तीनों के लिए भारी पड़ सकता है।
आज 18 सितंबर को उस त्रासदी की बरसी पर 151 मृतकों को याद करते हुए 1880 का इतिहास एक बार फिर यह बताता है कि पहाड़ों में भारी बारिश और अस्थिर ढलानों के बीच जल निकासी, वैज्ञानिक निर्माण और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है।