सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल क्रांति का इम्तिहान: यूपीआई शुल्क पर रोक लगाने से किया इनकार! केंद्र और आरबीआई से मांगा जवाब
भारत में कैशलेस इकोनॉमी' की रीढ़ बन चुके यूपीआई को लेकर एक नया कानूनी और आर्थिक घमासान शुरू हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाने के फैसले को अब देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर चार हफ्ते के भीतर जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने फिलहाल 15 अक्टूबर से लागू होने वाली इस नई व्यवस्था पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।
यूपीआई से जुड़े प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा यूपीआई पर्सन-टू-मर्चेंट लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने के सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम को नोटिस जारी किया है। हालांकि, अदालत ने फिलहाल इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले में याचिकाकर्ता ने यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लगाने से संबंधित सरकारी अधिसूचना को चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि मामला केवल कानूनी पहलू तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें तकनीकी और भुगतान व्यवस्था से जुड़े कई पहलू भी शामिल हैं। ऐसे में केंद्र, आरबीआई और एनपीसीआई का जवाब मामले की आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण होगा। आपको बता दें केंद्र सरकार की ओर से सितंबर में घोषित नए यूपीआई फ्रेमवर्क के तहत ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा पी2एम लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत लागू एमडीआर करने का प्रावधान किया गया है। सरकार के अनुसार यह शुल्क सीधे यूपीआई इस्तेमाल करने वाले ग्राहक से वसूलने के लिए नहीं है, बल्कि मर्चेंट पेमेंट इकोसिस्टम के भीतर लागू होने वाला शुल्क है। नई व्यवस्था 15 अक्टूबर से प्रभावी होने वाली है। सरकार का कहना है कि आम लोगों के पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी ) लेन-देन पर इस व्यवस्था का कोई असर नहीं पड़ेगा। यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को यूपीआई के जरिये कितनी भी राशि भेजी जाए, उसके लिए कोई एमडीआर लागू नहीं होगा। इसी तरह ₹2,000 तक के पी2एम भुगतान भी शून्य एमडीआर के दायरे में रहेंगे।केंद्र के मुताबिक नए ढांचे का प्रभाव सीमित संख्या में व्यापारी लेन-देन पर पड़ेगा। सरकार के आंकड़ों के अनुसार करीब 96 प्रतिशत पी2एम लेन-देन इस एमडीआर व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे। ₹2,000 से अधिक के निर्दिष्ट व्यापारी लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। ₹75,000 और उससे अधिक के लेन-देन के लिए एमडीआर की अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन रखी गई है। कुछ आवश्यक क्षेत्रों के लिए अलग व्यवस्था भी की गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर पांच रुपये का निश्चित एमडीआर प्रस्तावित है। वहीं कुछ पूंजी बाजार से जुड़े भुगतान के लिए अलग दर निर्धारित की गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि एमडीआर ग्राहक से वसूला जाने वाला शुल्क नहीं है। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि व्यापारी MDR का बोझ सीधे ग्राहकों पर न डालें। साथ ही यूपीआई एप्लीकेशन प्रोवाइडर्स को प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए शुल्क लगाने से प्रतिबंधित किया गया है। छोटे व्यापारियों को भी प्रस्तावित व्यवस्था में राहत दी गई है। सरकार के अनुसार यूपीआई क्यूआर के जरिये प्रति माह एक लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारी, जिनमें स्ट्रीट वेंडर और मोहल्ले की छोटी दुकानें शामिल हैं, शून्य-एमडीआर व्यवस्था के तहत बने रहेंगे। वही सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक से इनकार के बाद फिलहाल प्रस्तावित व्यवस्था पर 15 अक्टूबर से अमल का रास्ता खुला हुआ है। हालांकि, इस व्यवस्था की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत का अंतिम निर्णय अभी बाकी है। केंद्र, आरबीआई और एनपीसीआई के जवाब दाखिल होने के बाद मामले की अगली सुनवाई में इस व्यवस्था से जुड़े कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर आगे विचार होगा। यूपीआई देश में रोजमर्रा के डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे में एमडीआर की नई व्यवस्था का वास्तविक असर ग्राहकों, व्यापारियों और पूरे डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम पर कितना पड़ता है, यह आगे की न्यायिक सुनवाई और 15 अक्टूबर के बाद लागू होने वाली व्यवस्था से अधिक स्पष्ट होगा।