नैनीताल में बदलते बाहरी चेहरों पर सवाल:आखिर कौन हैं ये मौसमी चेहरे जो हर सीजन में आते हैं कारोबार के लिए और फिर हो जाते हैं गायब!सत्यापन, बैकग्राउंड और आय के श्रोतों की जांच की उठी मांग
पर्यटन नगरी नैनीताल की पहचान कभी उसकी झील, पहाड़ और शांत सामाजिक ताने-बाने से होती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में शहर का एक और चेहरा तेजी से उभरा है,ऐसे हजारों मौसमी श्रमिकों और कर्मचारियों का, जो पर्यटन सीजन के साथ शहर में दिखाई देते हैं और सीजन खत्म होते ही अचानक ओझल हो जाते हैं।
सवाल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति रोजगार की तलाश में नैनीताल क्यों आता है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन को यह मालूम है कि शहर में आने वाले इन लोगों का पूरा रिकॉर्ड क्या है? वे कहां से आते हैं, किन परिस्थितियों में यहां काम कर रहे हैं, उनका आपराधिक इतिहास क्या है और सीजन समाप्त होने के बाद वे कहां चले जाते हैं?
पर्यटन सीजन के दौरान शहर के होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे, ट्रैवल एजेंसियां और अन्य व्यवसाय बड़ी संख्या में बाहरी कर्मचारियों पर निर्भर दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अप्रैल से जुलाई के बीच अचानक ऐसे चेहरों की संख्या बढ़ जाती है जिन्हें शहर में पहले कभी नहीं देखा गया होता। यही लोग बाजारों, गली मोहल्लों, झील क्षेत्र ,स्कूल कॉलेज,और युवा वर्ग के बीच सहजता से घुल-मिल जाते हैं। लेकिन इनके बारे में आधिकारिक जानकारी आखिर किसके पास है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नैनीताल कोई साधारण शहर नहीं, बल्कि देश-दुनिया के पर्यटकों और हजारों छात्र-छात्राओं का शहर है। ऐसे में यहां रहने और काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पृष्ठभूमि का स्पष्ट रिकॉर्ड होना सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक माना जाता है।
पुलिस समय-समय पर सत्यापन अभियान चलाती है और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना भी लगाया जाता है। लेकिन ये सवाल भी लाजमी है कि क्या केवल दस हजार या उससे अधिक का चालान कर देना पर्याप्त समाधान है? यदि कोई व्यक्ति बिना सत्यापन के शहर में रह रहा है तो आर्थिक दंड के बाद भी वह यहीं बना रहता है। ऐसे में मूल प्रश्न वहीं का वहीं रह जाता है कि उसकी पहचान, पृष्ठभूमि और गतिविधियों की जवाबदेही कौन सुनिश्चित करेगा?
स्थानीय नागरिकों की एक और चिंता रोजगार से जुड़ी है। नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों के अनेक युवा आज भी सीमित अवसरों से जूझ रहे हैं। होटल उद्योग और पर्यटन व्यवसाय में बड़ी संख्या में बाहरी कर्मचारियों की मौजूदगी के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या स्थानीय युवाओं को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? क्या कम वेतन पर काम करने को तैयार बाहरी श्रमिकों के कारण स्थानीय युवाओं का रोजगार प्रभावित हो रहा है?
इस बहस का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष सामाजिक है। यहां के बुजुर्गों का कहना है कि नैनीताल की पहचान हमेशा एक सुरक्षित और पारिवारिक माहौल वाले शहर की रही है। लेकिन जब बड़ी संख्या में ऐसे लोग शहर में आते हैं जिनका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं होता, तो स्वाभाविक रूप से सुरक्षा और सामाजिक निगरानी को लेकर चिंताएं जन्म लेती हैं। बाहर से आए लोग यहां की शांत वादियों में जहर घोलने का काम करने लगे हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह मुद्दा किसी धर्म, जाति या क्षेत्र विशेष से जुड़ा नहीं है। सवाल केवल इतना है कि जो भी व्यक्ति शहर में रोजगार के लिए आता है, उसका सत्यापन, पृष्ठभूमि और रिकॉर्ड पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। यही व्यवस्था स्थानीय लोगों और स्वयं बाहरी श्रमिकों दोनों के हित में है।
नैनीताल के नागरिक अब प्रशासन से केवल औपचारिक सत्यापन अभियान नहीं, बल्कि एक व्यापक और पारदर्शी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। ऐसी व्यवस्था जिसमें शहर में काम करने वाले प्रत्येक मौसमी कर्मचारी का डिजिटल रिकॉर्ड हो, उसका स्थायी पता दर्ज हो, संबंधित थाने से सत्यापन हो और जरूरत पड़ने पर उसके पूर्ववृत्त की जानकारी भी उपलब्ध हो।
इतिहास गवाह है कि किसी भी शहर की समस्याएं अचानक पैदा नहीं होतीं। वे धीरे-धीरे आकार लेती हैं और जब तक उनका संज्ञान लिया जाता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।