बड़ी खबरः उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित करने का मामला! अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने पीएमओ और मुख्य न्यायाधीश को भेजा पत्र, बताया वन संरक्षण प्रावधानों के विपरीत
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित करने के प्रस्ताव को लेकर विवाद और गहरा गया है। हाईकोर्ट के अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को विस्तृत शिकायत भेजकर प्रस्तावित स्थल पर हाईकोर्ट परिसर बनाए जाने का विरोध किया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्रस्तावित भूमि आरक्षित वन क्षेत्र में आती है और उसका गैर-वानिकी कार्यों के लिए उपयोग वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 तथा वन (संरक्षण) नियम, 2023 के प्रावधानों के विपरीत है। शिकायत में कहा गया है कि हाईकोर्ट के लिए चिन्हित भूमि तराई पूर्वी वन प्रभाग के अंतर्गत स्थित है और यह किलपुरा-खटीमा-सुरई कॉरिडोर तथा गौला कॉरिडोर जैसे दो महत्वपूर्ण एशियाई हाथी गलियारों से जुड़ी हुई है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में बड़े निर्माण कार्य से हाथियों के प्राकृतिक आवागमन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के साथ ही वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
अधिवक्ता ने अपने पत्र में कहा है कि आरक्षित वन भूमि का गैर-वानिकी उपयोग राष्ट्रीय वन नीति और लागू वन संरक्षण कानूनों की भावना के विपरीत है। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य केंद्रीय वन एवं पर्यावरण संबंधी वैधानिक स्वीकृतियों के बिना आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। शिकायत में यह भी कहा गया है कि उत्तराखंड राज्य के गठन का प्रमुख उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों का विकास करना था। ऐसे में हाईकोर्ट को नैनीताल जैसे पर्वतीय शहर से मैदानी क्षेत्र में स्थानांतरित करना राज्य पुनर्गठन की मूल भावना के भी विपरीत होगा। अधिवक्ता का दावा है कि यदि हाईकोर्ट नैनीताल से हटता है तो स्थानीय व्यापार, पर्यटन और हजारों लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन और तेज हो सकता है। पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का भी उल्लेख करते हुए कहा गया है कि शीर्ष कोर्ट ने केवल न्यायालय की अवस्थापना संबंधी समस्याओं के समाधान पर जोर दिया था, न कि आरक्षित वन भूमि की प्रकृति बदलकर वहां निर्माण कार्य करने की अनुमति दी थी। इसी आधार पर प्रधानमंत्री कार्यालय से पूरे मामले में हस्तक्षेप कर प्रस्ताव की समीक्षा कराने और वन एवं पर्यावरण कानूनों का पालन सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया है।
वहीं मुख्य न्यायाधीश को भेजे पत्र में अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित स्थानांतरण की प्रक्रिया वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन (संरक्षण) नियम, 2023 तथा केंद्र सरकार की 29 दिसंबर 2023 की समेकित गाइडलाइन के विपरीत आगे बढ़ाई जा रही है। भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि जिला प्रशासन ने 14 मई 2026 को हाईकोर्ट के स्थानांतरण के लिए तीन स्थान प्रस्तावित किए थे। इनमें से एक स्थल को पहले ही क्षेत्रीय सशक्त समिति (REC) अनुपयुक्त मान चुकी है, जबकि दूसरे प्रस्तावित आरक्षित वन क्षेत्र के संबंध में केंद्र सरकार से वन भूमि के डायवर्जन अथवा डी-रिजर्वेशन की अनिवार्य स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई है। शिकायत में कहा गया है कि बिना वैधानिक अनुमति के आरक्षित वन भूमि को हाईकोर्ट परिसर के निर्माण के लिए प्रस्तावित करना कानून के अनुरूप नहीं है। अधिवक्ता का दावा है कि जिला मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट और उसके आधार पर 19 जून 2026 को पारित फुल कोर्ट का प्रस्ताव वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
शिकायत में यह भी तर्क दिया गया है कि वन (संरक्षण) नियम, 2023 के अनुसार कार्यालय या अन्य गैर-स्थल-विशिष्ट (Non Site Specific) परियोजनाओं के लिए आरक्षित वन भूमि के उपयोग पर प्रतिबंध है। हाईकोर्ट भवन का निर्माण इसी श्रेणी में आता है, इसलिए प्रस्तावित भूमि का उपयोग नियमों के विपरीत बताया गया है। अधिवक्ता ने यह भी कहा है कि प्रस्तावित भूमि के बदले प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की कोई स्पष्ट योजना भी प्रस्तुत नहीं की गई है, जबकि यह कानूनी प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। शिकायत में यह भी आशंका जताई गई है कि तराई क्षेत्र के आरक्षित वन में निर्माण से हाथियों के कॉरिडोर और वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में सुप्रीम कोर्ट तथा उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना आरक्षित वन भूमि को गैर-वन उपयोग में नहीं लाया जा सकता।
शिकायत में मुख्य न्यायाधीश से मांग की गई है कि 19 जून 2026 के फुल कोर्ट प्रस्ताव को निरस्त किया जाए तथा हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित करने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। साथ ही आरोप लगाया गया है कि यदि वन कानूनों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई भी की जानी चाहिए। इसके अलावा शिकायत में यह भी कहा गया है कि हाईकोर्ट का नैनीताल में बने रहना पहाड़ी क्षेत्र के विकास, स्थानीय रोजगार और संवैधानिक उद्देश्यों के अनुरूप है तथा केवल आधारभूत सुविधाओं की समस्या को स्थानांतरण का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।







