बुर्का, पर्दा और महिलाओं की स्वतंत्रता पर इम्तियाज अली की बेबाक राय से उठे सवाल! समर्थन और विरोध के बीच सोशल मीडिया पर छिड़ी तीखी बहस
नई दिल्ली। अपनी फिल्मों में संवेदनशील विषयों और मजबूत महिला किरदारों को प्रमुखता से दिखाने वाले फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। हालांकि इस बार वजह उनकी कोई फिल्म नहीं, बल्कि महिलाओं के बुर्का और पर्दा प्रथा को लेकर दिया गया बयान है। उनके एक हालिया इंटरव्यू के कुछ अंश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिन पर समर्थक और विरोधी दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इम्तियाज अली ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि जब महिलाएं यह कहती हैं कि वे बुर्का या पर्दे में सहज महसूस करती हैं, तो उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती। उनके अनुसार ऐसे सामाजिक नियम, जो किसी व्यक्ति विशेष पर पाबंदियां लगाते हैं, उन्हें सामान्य या सहज मान लेना समाज के लिए चिंताजनक संकेत हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई महिला यह महसूस करती है कि वह ऐसी व्यवस्था में पूरी तरह सहज है, तो यह उस सामाजिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है, जहां लंबे समय से चली आ रही पाबंदियों को सामान्य जीवन का हिस्सा मान लिया गया है। निर्देशक ने इसे ‘गिरे हुए समाज की निशानी’ बताते हुए कहा कि कहीं न कहीं यह मानसिक स्तर पर स्वीकार कर ली गई सीमाओं और प्रतिबंधों का परिणाम हो सकता है। इंटरव्यू के दौरान इम्तियाज अली ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने ऊपर लागू सामाजिक बंधनों को ही अपनी सहजता का आधार मानने लगे, तो यह स्थिति चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो व्यक्ति अपने विक्टिमाइजेशन यानी पीड़ित बनाए जाने की प्रक्रिया को ही सामान्य मान बैठा हो। उनकी इसी टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने इसे महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों के पक्ष में दिया गया बयान बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वाला दृष्टिकोण माना।
किसी समुदाय को निशाना बनाने से किया इनकार
विवाद बढ़ने के बाद इंटरव्यू में ही इम्तियाज अली ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी विशेष धर्म, समुदाय या व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं है। उन्होंने कहा कि वह किसी को यह नहीं बता रहे कि उसे क्या पहनना चाहिए या कैसे जीवन जीना चाहिए। निर्देशक ने कहा कि वह केवल अपने विचार रख रहे हैं और किसी की व्यक्तिगत पसंद पर टिप्पणी करने का अधिकार अपने पास नहीं मानते। उनके अनुसार समाज में संवाद और असहमति दोनों के लिए जगह होनी चाहिए। इम्तियाज अली ने वर्तमान सामाजिक माहौल पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के समय में संतुलित और संयमित सोच रखने वाले लोगों की संख्या कम होती जा रही है। हर मुद्दे पर लोग दो धड़ों में बंट जाते हैं, जिससे सार्थक संवाद मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि किसी विषय पर अलग राय रखने वाला व्यक्ति दुश्मन नहीं होता। लोकतांत्रिक समाज में मतभेद स्वाभाविक हैं और इन्हें टकराव की बजाय संवाद के माध्यम से समझा जाना चाहिए। उन्होंने सामाजिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान को समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया।
सोशल मीडिया पर मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया
इम्तियाज अली के बयान के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। एक वर्ग ने उनके विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और विकल्पों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। वहीं दूसरे वर्ग ने कहा कि यदि कोई महिला अपनी इच्छा से बुर्का या पर्दा अपनाती हैए तो उसकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए। कई यूजर्स ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक परंपराओं की बहस बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा संवेदनशील विषय करार दिया।
फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ को लेकर भी चर्चा में हैं इम्तियाज
विवादों के बीच इम्तियाज अली अपनी नई फिल्म मैं वापस आऊंगा को लेकर भी सुर्खियों में हैं। फिल्म को समीक्षकों और दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना और शरवरी वाघ प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए हैं। कहानी वर्ष 1947 के भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें एक बुजुर्ग व्यक्ति की भावनात्मक यात्रा को दिखाया गया है, जो विस्थापन के दशकों बाद आज के पाकिस्तान में स्थित अपने पुश्तैनी घर लौटना चाहता है। फिल्म प्रेम, बिछड़न, स्मृतियों, पहचान और अपनेपन जैसे मानवीय विषयों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ती है।