एक डॉक्टर, तीन जिले और तीन सरकारी वेतन: रिश्वत में पकड़ा गया ‘सुपर डॉक्टर’! एक साथ तीन जिलों में कर रहा था सरकारी नौकरी, कठघरे में खड़ा स्वास्थ्य विभाग
भोपाल। मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी व्यवस्था, डिजिटल उपस्थिति प्रणाली और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महज 5 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़े गए एक संविदा डॉक्टर की जांच में ऐसा खुलासा हुआ कि अधिकारी भी हैरान रह गए। आरोप है कि डॉक्टर एक ही समय में राज्य के तीन अलग-अलग जिलों के सरकारी अस्पतालों में संविदा पर नियुक्त था और तीनों स्थानों से नियमित रूप से सरकारी वेतन भी ले रहा था। मामले के केंद्र में डॉ. महेश चंद्र शर्मा हैं, जिन्हें 3 जुलाई को रीवा लोकायुक्त की टीम ने शहडोल जिले के ऊफरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में 5 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। शुरुआती तौर पर इसे रिश्वतखोरी का सामान्य मामला माना जा रहा था, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो सामने आए तथ्यों ने पूरे स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा कर दिया।
एक डॉक्टर, तीन जिले और तीन सरकारी वेतन
जांच में सामने आया कि डॉ. शर्मा की नियुक्ति शहडोल, खरगोन और श्योपुर—तीनों जिलों में संविदा चिकित्सक के रूप में दर्ज थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि तीनों स्थानों से उन्हें हर महीने लगभग 65-65 हजार रुपये वेतन मिल रहा था। इस तरह वे हर माह करीब 1 लाख 95 हजार रुपये सरकारी खजाने से प्राप्त कर रहे थे। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा। अब विभाग यह पता लगाने में जुटा है कि आखिर एक ही व्यक्ति की नियुक्ति तीन जिलों में कैसे हुई और वेतन भुगतान की प्रक्रिया में यह अनियमितता वर्षों तक कैसे नजरअंदाज होती रही। बताया जा रहा है कि डॉ. शर्मा एक तबादला आदेश निरस्त कराने के लिए कथित रूप से रिश्वत ले रहे थे। शिकायत मिलने पर लोकायुक्त ने जाल बिछाया और उन्हें रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद जब अधिकारियों ने उनके सेवा रिकॉर्ड और नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों की जांच शुरू की तो तीन जिलों में एक साथ नौकरी करने का मामला सामने आया। यही वह बिंदु था, जहां एक मामूली रिश्वत का मामला सरकारी तंत्र में संभावित बड़े फर्जीवाड़े में बदल गया। इस पूरे प्रकरण ने राज्य के डिजिटल उपस्थिति (डिजिटल अटेंडेंस) सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि डॉक्टर वास्तव में तीन अलग-अलग जिलों में नियुक्त थे, तो उनकी उपस्थिति किस आधार पर दर्ज की जा रही थी? क्या किसी स्तर पर फर्जी हाजिरी लगाई जा रही थी या फिर निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल रहा? खरगोन के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) ने बताया कि मामले की विभागीय जांच के लिए लिखा गया है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि डॉक्टर की अनुपस्थिति को लेकर पहले भी नोटिस जारी किया गया था।
पहले भी मिल चुका था नोटिस
जानकारी के अनुसार, खरगोन में डॉ. शर्मा लगातार अनुपस्थित रहने के कारण विभाग की निगरानी में थे। इतना ही नहीं, जून 2026 में एक प्रसूता की मौत के मामले में भी उन्हें कारण बताओ (शोकॉज) नोटिस जारी किया गया था। इसके बावजूद उनकी सेवा और वेतन भुगतान की प्रक्रिया जारी रही। अब जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि संबंधित अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की और क्या इस पूरे मामले में अन्य कर्मचारियों या अधिकारियों की भी भूमिका रही है। शहडोल जिला प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि मामले में एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। नियुक्ति, उपस्थिति, वेतन भुगतान और सेवा अभिलेखों की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि यह केवल एक व्यक्ति की अनियमितता थी या फिर इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका भी है। यदि जांच में वित्तीय अनियमितता और दस्तावेजों में हेरफेर की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।