बड़ी खबरः सुप्रीम कोर्ट ने पलटा तीन अदालतों का फैसला! कहा- परंपरा साबित किए बिना ‘घर-दामाद’ नहीं बन सकता संपत्ति का उत्तराधिकारी, लिंक में जानें क्या है पूरा मामला?

Big News: Supreme Court overturns the verdict of three lower courts! Rules that a 'Ghar-Damad' (resident son-in-law) cannot inherit property without proving the existence of such a custom; click the

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय से जुड़े संपत्ति विवाद में ऐसा फैसला सुनाया है, जो भविष्य में पारंपरिक उत्तराधिकार से जुड़े मामलों के लिए मिसाल बन सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल ‘घर-दामाद’ होने का दावा कर कोई व्यक्ति पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता, जब तक यह साबित न कर दिया जाए कि संबंधित समुदाय में ऐसी मान्य और स्थापित परंपरा वास्तव में मौजूद है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में तीन अदालतों के एक जैसे फैसलों को पलट दिया। जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि किसी परंपरा को साबित करने की जिम्मेदारी हमेशा उस पक्ष की होती है, जो उसका दावा करता है। पीठ ने उस दावे को खारिज कर दिया कि लेदुरा उरांव अपनी संपत्ति का उत्तराधिकार देने के लिए अपनी भतीजी के पति पुनाई उरांव को घर-दामाद के तौर पर गोद ले सकते थे। यह विवाद एक उरांव परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर उत्पन्न हुआ, जहां प्रतिवादियों ने पुनाई उरांव के जरिये उत्तराधिकार का दावा इस आधार पर किया कि उन्हें बिना संतान वाले लेदुरा उरांव ने घर-दामाद के रूप में स्वीकार किया था। हालांकि, याचिकाकर्ता बेजला उरांव ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि ऐसी कोई सामान्य परंपरा नहीं है। अदालत ने माना कि प्रतिवादी ऐसी परंपरा का अस्तित्व साबित करने में नाकाम रहे और वादी के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और झारखंड हाईकोर्ट के निर्णयों को खारिज कर दिया।