नैनीतालः महेंद्र सिंह राणा के प्रमोशन पर घिरे कुलपति! बोले- कोर्ट ने रोकने को नहीं कहा, बड़ा सवाल- तो फिर फाइनल हियरिंग क्यों नहीं हो रही?

Nainital: Vice-Chancellor under fire over Mahendra Singh Rana's promotion! Claims the court did not order a stay; the big question—then why isn't the final hearing taking place?

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के डॉ. महेंद्र सिंह राणा की नियुक्ति और लगातार हो रहे प्रमोशन को लेकर कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत से प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखे सवाल किए गए। राणा की नियुक्ति से जुड़ा मामला वर्ष 2012 से न्यायिक विवाद में है और वर्ष 2015 से फाइनल हियरिंग में लंबित बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठाया गया कि जब मामला हाईकोर्ट में लंबित है तो विश्वविद्यालय की ओर से इसके शीघ्र निस्तारण के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं और राणा को लगातार प्रमोशन किस आधार पर दिए जा रहे हैं। सवाल के जवाब में कुलपति ने कहा कि जब भी मामले की सुनवाई होती है, विश्वविद्यालय का वकील कोर्ट में उपस्थित होता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने वकील से भी इस संबंध में बात की है और दिल्ली से वकील रखा गया है। कुलपति के मुताबिक सुनवाई की तारीख तय करना न्यायाधीश का अधिकार है, उनका नहीं।

पहले के तीन प्रमोशन मेरे आने से पहले हुए
डॉ. राणा के प्रमोशन पर कुलपति ने कहा कि उनके कार्यकाल से पहले ही तीन प्रमोशन हो चुके थे। इस पर सवाल किया गया कि यदि पहले कोई निर्णय गलत हुआ हो तो बाद का निर्णय उसे सही ठहराने का आधार कैसे बन सकता है। इस पर कुलपति ने स्पष्ट किया कि वह ऐसा नहीं कह रहे हैं। हालांकि, इसके बाद कुलपति की सफाई पर एक और सवाल खड़ा हुआ। कुलपति ने कहा कि कोर्ट ने कहीं यह उल्लेख नहीं किया है कि प्रमोशन नहीं दिया जा सकता। इस पर आवाज़ इंडिया की पत्रकार ने पूछा कि क्या कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश दिया है जिसमें प्रमोशन देने की अनुमति दी गई हो? इस पर कुलपति ने कहा कि यदि ऐसा माना जाए तो फिर राणा को मिलने वाले इंक्रीमेंट पर भी सवाल उठेगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में उन्होंने अपने वकील से राय ली है और कानून के अनुसार प्रमोशन दिया जा सकता है।

कोर्ट ने रोक नहीं लगाई, लेकिन अनुमति भी नहीं दी?
कुलपति की इस दलील के बाद मूल सवाल अब भी कायम है। यदि कोर्ट ने प्रमोशन पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया है, तो क्या इसका अर्थ यह माना जा सकता है कि विश्वविद्यालय को प्रमोशन देने की स्वत: अनुमति मिल गई? दूसरी ओर, यदि कोर्ट ने प्रमोशन जारी रखने का कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया है तो विश्वविद्यालय ने किस वैधानिक प्रावधान के आधार पर प्रमोशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई? कुलपति ने इस संबंध में अपने वकील की कानूनी राय का हवाला दिया, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में उस राय या ऐसे किसी न्यायिक आदेश को सार्वजनिक नहीं किया गया, जिसके आधार पर राणा को प्रमोशन दिए जाने की वैधानिक स्थिति स्पष्ट हो सके।

पुराने प्रमोशन का हवाला देकर मौजूदा फैसले से किनारा?
कुलपति का यह कहना कि शुरुआती तीन प्रमोशन उनके कार्यकाल से पहले हुए, अपने आप में एक अलग सवाल खड़ा करता है। वर्तमान विवाद केवल पुराने प्रमोशन को लेकर नहीं है, बल्कि यह भी सवाल है कि कुलपति के कार्यकाल में भी राणा को सेवा लाभ और प्रमोशन की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ी। यदि विश्वविद्यालय मानता है कि राणा को प्रमोशन देना नियमसम्मत है तो नियुक्ति से लेकर प्रमोशन तक की पूरी प्रक्रिया, संबंधित नियम और कानूनी राय सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं यदि मूल नियुक्ति की वैधता का मामला अभी भी कोर्ट में विचाराधीन है, तो अंतिम न्यायिक निर्णय से पहले लगातार प्रमोशन दिए जाने को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब भी विश्वविद्यालय प्रशासन को देना होगा।

2015 से फाइनल हियरिंग में मामला
राणा की नियुक्ति से जुड़ा विवाद लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया में है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी सवाल उठाया गया कि वर्ष 2015 से मामला फाइनल हियरिंग में बताया जा रहा है, लेकिन अभी तक इसका अंतिम निस्तारण नहीं हुआ। कुलपति ने इसके जवाब में विश्वविद्यालय की ओर से हर सुनवाई में वकील के उपस्थित होने की बात कही। अब सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय ने मामले की शीघ्र सुनवाई और निस्तारण के लिए कोई विशेष कानूनी पहल की है। यदि विश्वविद्यालय स्वयं इस मामले में पक्षकार है तो केवल सुनवाई की तारीख आने का इंतजार करने के बजाय मामले के शीघ्र निस्तारण के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए, यह भी महत्वपूर्ण है। फिलहाल कुलपति की सफाई के बाद भी डॉ. महेंद्र सिंह राणा की नियुक्ति, उनके प्रमोशन और लंबित न्यायिक मामले को लेकर कई सवाल अनुत्तरित हैं। खास तौर पर यह सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है कि जब कोर्ट ने प्रमोशन रोकने का स्पष्ट आदेश नहीं दिया, तो क्या कोर्ट ने प्रमोशन जारी रखने की स्पष्ट अनुमति भी दी थी? यदि नहीं, तो विश्वविद्यालय ने किस नियम और कानूनी आधार पर प्रमोशन जारी रखा, इसका दस्तावेजी जवाब सामने आना बाकी है।