Sep 30, 2026 Login

नैनीताल:मां, भाई और गर्भवती भाभी की हत्या के दोषी की फांसी पर हाईकोर्ट ने रखा फैसला सुरक्षित!निचली अदालत से सुनाई गई थी मृत्युदंड की सजा

Nainital: The High Court has reserved its decision on the death sentence of the man convicted of murdering his mother, brother, and pregnant sister-in-law. The lower court had awarded him the death p

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने टिहरी गढ़वाल में अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से हत्या करने के दोषी संजय सिंह को निचली अदालत से सुनाई गई मृत्युदंड की सजा के मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की गई। रिपोर्ट के अनुसार अभियुक्त को उसकी मानसिक स्थिति के परीक्षण के लिए एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों को दिखाया गया था। उपचार के बाद उसकी मानसिक स्थिति में काफी सुधार बताया गया है और वह बिना किसी सहायता के संवाद करने में सक्षम है।
वहीं, अभियुक्त की ओर से पैरवी करते हुए कहा गया कि घटना के समय उसकी मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी। यह भी तर्क दिया गया कि मृत्युदंड सुनाए जाने से पहले ट्रायल कोर्ट ने उसकी मानसिक स्थिति की समुचित जांच नहीं कराई।
मामले के अनुसार टिहरी गढ़वाल के गुमाल गांव निवासी संजय सिंह ने 13 दिसंबर 2014 को मामूली विवाद के बाद अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से हत्या कर दी थी। घटना की रिपोर्ट उसके पिता राम सिंह पंवार ने दर्ज कराई थी।
इस मामले में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमा पांडेय की कोर्ट ने अगस्त 2021 में संजय सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में इस सजा को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ को न्याय मित्र नियुक्त किया था। न्याय मित्र ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि मृत्युदंड की सजा पाए संजय सिंह की मानसिक स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित रही है। मेडिकल बोर्ड ने भी उसे मानसिक रूप से बीमार बताया था और अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वह अपने कृत्य के परिणामों को समझने की स्थिति में नहीं था। हालांकि, रिपोर्ट में उपचार के बाद उसके ठीक होने की संभावना भी बताई गई थी।
अभियुक्त की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि उसकी मानसिक स्थिति से जुड़े इन तथ्यों को ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।