Oct 17, 2026 Login
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आसाराम को हाईकोर्ट से बड़ा झटका: नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में उम्रकैद बरकरार,अब करना होगा सरेंडर

Major Setback for Asaram from High Court: Life Imprisonment Upheld in Sexual Assault Case Involving a Minor; Must Now Surrender

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने बुधवार को एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आसाराम की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के फैसले को सही ठहराया। वर्तमान में अंतरिम जमानत पर बाहर चल रहे आसाराम को अब अदालत के आदेशानुसार जोधपुर सेंट्रल जेल में सरेंडर करना होगा। हालांकि, इसी मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने बुधवार को स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को बड़ा झटका देते हुए नाबालिग से यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म मामले में दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत के इस फैसले के बाद फिलहाल अंतरिम जमानत पर चल रहे आसाराम को अब जोधपुर सेंट्रल जेल में सरेंडर करना होगा। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। हालांकि अदालत ने मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने 20 अप्रैल को लंबी सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सार्वजनिक किया गया है। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि पीड़िता द्वारा लगाए गए दुष्कर्म के आरोप विश्वसनीय हैं और उपलब्ध साक्ष्यों से पूरी तरह समर्थित हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत आसाराम की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को सही ठहराया। इस मामले में हाईकोर्ट में 16 फरवरी से 20 अप्रैल 2026 तक लगातार डे-टू-डे सुनवाई चली। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में दावा किया कि पूरा मामला मनगढ़ंत है और पीड़िता तथा उसके माता-पिता के बयानों में कई विरोधाभास हैं। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि घटना की रात आसाराम और पीड़िता के बीच किसी प्रकार का कॉल रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। साथ ही “समानता के सिद्धांत” का हवाला देते हुए यह तर्क रखा गया कि जिन साक्ष्यों के आधार पर अन्य आरोपियों को राहत दी गई, उन्हीं साक्ष्यों पर आसाराम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वहीं अभियोजन पक्ष और पीड़िता के अधिवक्ता पी.सी. सोलंकी ने अदालत में जोरदार दलील पेश करते हुए कहा कि पॉक्सो मामलों में पीड़िता का एकल बयान भी दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त माना जाता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता के बयान को विशेष महत्व प्राप्त है। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि मामले से जुड़े गवाहों पर हमले और हत्याएं इस बात का संकेत हैं कि साक्ष्यों को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। फैसले के बाद पीड़िता पक्ष के अधिवक्ता पी.सी. सोलंकी ने कहा कि अदालत ने सभी तथ्यों, गवाहों और साक्ष्यों पर गंभीरता से विचार करने के बाद न्यायसंगत फैसला सुनाया है। गौरतलब है कि 25 अप्रैल 2018 को जोधपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के मामले में आसाराम को दोषी करार देते हुए अंतिम सांस तक कारावास की सजा सुनाई थी। उसी मामले में सह-आरोपियों शरद और शिल्पी को 20-20 साल की सजा दी गई थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सभी आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। यह मामला उस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बना था, जब एक नाबालिग छात्रा ने आरोप लगाया था कि धार्मिक उपचार और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के बहाने उसे आश्रम बुलाकर उसके साथ यौन शोषण किया गया। पुलिस जांच, मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आसाराम को दोषी माना था।