वाराणसी बिरयानी मामलाः सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की बड़ी टिप्पणी! कहा- गंगा में चिकन खाने से रोकने का कोई कानून नहीं, मुस्लिम छात्रों की गिरफ्तारी को बताया गलत
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी के दौरान कुछ युवकों द्वारा चिकन बिरयानी खाने और हड्डियां फेंकने के मामले में बड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि गंगा नदी में चिकन खाना कोई अपराध नहीं है और इसके लिए किसी को जेल में नहीं डाला जा सकता। भोपाल में नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में जस्टिस जीपी सिंह के चौथे मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां ने बताया कि युवाओं को ऐसी चीज़ के लिए तीन महीने जेल में बिताने पड़े जो कोई अपराध नहीं है।
जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, “मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध नहीं हो सकता। उन्हें इसी वजह से गिरफ्तार किया गया था और उन्हें तीन महीने जेल में रहना पड़ा।” वाराणसी पुलिस ने मार्च में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 और 299 के तहत धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दुश्मनी बढ़ाने, पब्लिक न्यूसेंस और वॉटर पॉल्यूशन कंट्रोल एक्ट का उल्लंघन करने के आरोप में 14 मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया था। शिकायत करने वालों ने आरोप लगाया कि युवा चिकन बिरयानी खा रहे थे और मांस की हड्डियां और बचा हुआ खाना सीधे पवित्र नदी में फेंक रहे थे, जिसका सनातन धर्म में गहरा आध्यात्मिक महत्व है।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन असहमति के आम कामों को भी अब आपराधिक माना जा रहा है। उन्होंने आगे कहा, “अपने विचार रखने और शांति से प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकों की बुनियादी आज़ादी है। बहस और असहमति लोकतंत्र का सार है। दुर्भाग्य से आम कामों को भी क्रिमिनल बनाया जा रहा है।” जस्टिस उज्जल भुइयां ने बताया कि पर्यावरण पर चिंता जताने वाले लोगों के साथ अपराधी जैसा बर्ताव किया जाता है और कैंपस में विरोध प्रदर्शन के लिए छात्रों को एक महीने से ज़्यादा जेल में रहना पड़ता है। जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, “जो लोग पर्यावरण के नुकसान पर अपनी नाराज़गी जताने आते हैं, जो एक सच्चाई है, उन्हें ऐसे भगा दिया जाता है जैसे वे क्रिमिनल हों।
कैंपस में विरोध करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें 30-40 दिनों तक ज़मानत नहीं मिलती। छात्रों को अक्सर सस्पेंड भी कर दिया जाता है, जिससे उन्हें अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने से पहले कोर्ट जाना पड़ता है। क्या कोर्ट असहमति को हतोत्साहित कर रहे हैं? जस्टिस उज्जल भुइयां ने सवाल किया कि क्या कोर्ट, ज़मानत की पाबंदी वाली शर्तों के ज़रिए, असहमति को भी हतोत्साहित कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ” हालांकि कोर्ट जवाबदेह हैं और ज़मानत देते हैं, लेकिन कई बार इसमें देर हो जाती है। लेकिन ज़मानत देते समय लगाई जाने वाली पाबंदी वाली शर्तें ही सबसे बड़ी चिंता का कारण हैं। ऐसे पाबंदी वाले आदेशों से, क्या कोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को अपनी असहमति ज़ाहिर न करने के लिए कह रहे हैं या उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं?”