Sep 09, 2026 Login

Big Breaking: हल्द्वानी बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामला! 17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में फिर होगी सुनवाई

Major Breaking: Haldwani-Banbhoolpura railway encroachment case! Hearing to be held again in the Supreme Court on September 17.

हल्द्वानी। बनभूलपुरा के रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद के बीच अब अगली सुनवाई की तारीख सामने आ गई है। सुप्रीम कोर्ट में लंबित अब्दुल मतीन सिद्दीकी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले की अगली संभावित सुनवाई 17 सितंबर 2026 को होगी। सुप्रीम कोर्ट के केस स्टेटस में 9 सितंबर की कार्यवाही के बाद मामले को लंबित दर्शाते हुए 17 सितंबर को सूचीबद्ध किए जाने की संभावित तारीख दर्ज की गई है। दरअसल, 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष मामला सूचीबद्ध हुआ था। मामले में दायर Early Hearing Application का निस्तारण कर दिया गया है, जबकि मूल सिविल अपील अभी लंबित है। इसके बाद केस की अगली संभावित लिस्टिंग 17 सितंबर दर्ज की गई है। ऐसे में अब 17 सितंबर की सुनवाई पर सबकी नजरें रहेंगी।

यह वही मामला है जिसमें हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास रेलवे और राज्य सरकार की जमीन पर कथित अतिक्रमण हटाने को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 के अपने आदेश में कहा था कि विवाद हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास रेलवे/राज्य सरकार की भूमि से कथित अनधिकृत कब्जेदारों को हटाने से जुड़ा है। अदालत के समक्ष करीब 30.040 हेक्टेयर सार्वजनिक भूमि, 4,365 मकानों और 50 हजार से अधिक आबादी का आंकड़ा रखा गया था। बाद में रेलवे की ओर से परियोजना के लिए करीब 30.65 हेक्टेयर भूमि आवश्यक बताए जाने की जानकारी अदालत के सामने रखी गई। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल जमीन खाली कराने के पहलू को ही नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को भी महत्वपूर्ण माना है। फरवरी में अदालत ने उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करने में सहायता देने के लिए पुनर्वास शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने परिवारवार पात्रता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति की रिपोर्ट भी मांगी थी। 

इस विवाद की अहम कड़ी जुलाई 2024 की सुनवाई भी रही थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे और राज्य सरकार को तत्काल यह पहचानने को कहा था कि रेलवे लाइन के स्थानांतरण और जरूरी ढांचे के लिए वास्तव में कितनी जमीन चाहिए, कितने परिवार प्रभावित होंगे और उनके पुनर्वास के लिए क्या व्यवस्था की जा सकती है।