नैनीताल से हाईकोर्ट स्थानांतरण पर कानूनी चुनौती!आरक्षित वन और हाथी कॉरिडोर की भूमि पर प्रस्ताव के खिलाफ दायर हुई जनहित याचिका!
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से ऊधमसिंह नगर के रुद्रपुर स्थित लामाचौड़ क्षेत्र में स्थानांतरित किए जाने के प्रस्ताव को लेकर नया कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। इस प्रस्ताव को चुनौती देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट में एक जनहित रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें प्रस्तावित भूमि को आरक्षित वन और हाथी कॉरिडोर का हिस्सा बताते हुए स्थानांतरण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
रमन कुमार शाह बनाम उत्तराखंड हाईकोर्ट एवं अन्य शीर्षक से दायर रिट याचिका (डब्ल्यूपी एम/एस संख्या-2376/2026) तीन अगस्त 2026 को दाखिल की गई है। मामले में जल्द सुनवाई होने की संभावना जताई जा रही है।
याचिका में कहा गया है कि नैनीताल के जिलाधिकारी द्वारा 14 मई 2026 को भेजे गए पत्र और 19 जून 2026 को हाईकोर्ट की फुल कोर्ट द्वारा पारित प्रस्ताव के आधार पर रुद्रपुर स्थित तराई पूर्व वन प्रभाग की भाकड़ा रेंज के प्लॉट संख्या 46 एवं 47 (लामाचौड़ ब्लॉक) को हाईकोर्ट परिसर के लिए प्रस्तावित किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रस्ताव वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन (संरक्षण) नियम, 2023 तथा केंद्र सरकार के 29 दिसंबर 2023 के दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है।
याचिका के अनुसार, प्रस्तावित भूमि आरक्षित वन क्षेत्र होने के साथ-साथ हाथियों के प्राकृतिक आवागमन वाले कॉरिडोर का भी हिस्सा है। ऐसे में इस भूमि का गैर-वन उपयोग पर्यावरण और वन कानूनों के विपरीत होगा।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि उत्तराखंड राज्य का गठन पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और वहां महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना के उद्देश्य से हुआ था। ऐसे में हाईकोर्ट को पर्वतीय क्षेत्र नैनीताल से मैदानी क्षेत्र रुद्रपुर स्थानांतरित करना राज्य गठन की मूल भावना के विपरीत है और इससे पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन को बढ़ावा मिल सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि हाईकोर्ट के स्थानांतरण पर सार्वजनिक धन के रूप में करोड़ों रुपये खर्च होंगे, जबकि राज्य पहले से वित्तीय चुनौतियों और कर्ज के दबाव का सामना कर रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इतनी बड़ी राशि स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किया जाना अधिक उचित होगा।
सुप्रीम कोर्ट के 15 जुलाई 2026 के आदेश का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने केवल भूमि को "जैसी है, जहां है" (As Is Where Is) के आधार पर हस्तांतरित करने की अनुमति दी थी। इससे भूमि का आरक्षित वन का दर्जा समाप्त नहीं होता और उसकी प्रकृति में बदलाव केवल केंद्र सरकार की विधिक स्वीकृति के बाद ही संभव है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में गैर-स्थल विशिष्ट (Non Site Specific) परियोजनाओं के लिए आरक्षित वन भूमि के उपयोग पर स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं। उनका आरोप है कि जिलाधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आरक्षित वन भूमि को हाईकोर्ट के लिए प्रस्तावित किया है। याचिका में इस संबंध में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 3ए और 3बी के तहत भी कार्रवाई की मांग का आधार प्रस्तुत किया गया है।