Sep 16, 2026 Login

यूपीआई भुगतान पर शुल्क का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट: 2000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर एमडीआर लगाने की अधिसूचना को चुनौती,ग्राहकों पर बोझ की आशंका

Issue of charges on UPI payments reaches Supreme Court: Notification imposing MDR on transactions exceeding ₹2,000 challenged; concerns raised about the burden on customers.

नई दिल्ली। भारत की कैशलेस अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले पर कानूनी विवाद शुरू हो गया है। 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर एमडीआर लगाने के फैसले को बुधवार को शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में चुनौती दी गई। वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर इस याचिका में वित्त मंत्रालय द्वारा 14 और 15 सितंबर को जारी राजपत्र (गैजेट) अधिसूचनाओं को तुरंत रद्द करने की मांग की गई है।

2000 रूपए से अधिक के चुनिंदा यूपीआई व्यापारी भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। बुधवार को दायर याचिका में केंद्र सरकार की ओर से 14 और 15 सितंबर को जारी किए गए संबंधित गजट नोटिफिकेशन को रद्द करने की मांग की गई है। याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दायर की गई है। याचिका में केंद्र सरकार के साथ भारतीय रिजर्व बैंक, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने शुल्क व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि इसका अंतिम प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ सकता है। याचिका में आशंका व्यक्त की गई है कि व्यापारी एमडीआर के रूप में लगने वाली लागत को वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचा सकते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार याचिका को अभी किसी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया है। ऐसे में इस मामले में अदालत की ओर से सुनवाई या किसी अंतरिम आदेश की स्थिति अभी सामने नहीं आई है। केंद्र सरकार की ओर से घोषित व्यवस्था के तहत 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के पात्र पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर  लागू किया जाना है। इसके साथ ही आम लोगों के बीच होने वाले पर्सन-टू-पर्सन भुगतान और छोटे व्यापारियों से जुड़े निर्धारित लेन-देन को शुल्क से बाहर रखा गया है। सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि एमडीआर ग्राहक से सीधे वसूला जाने वाला शुल्क नहीं है। यह व्यापारी भुगतान से जुड़े डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में लागू शुल्क है। सरकार का तर्क है कि शुल्क व्यवस्था का उद्देश्य यूपीआई के डिजिटल भुगतान ढांचे को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखना है। नई व्यवस्था में छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिए मौजूदा जीरो-एमडीआर प्रावधान जारी रखने की बात कही गई है। वहीं बड़े मूल्य के कुछ व्यापारी लेन-देन के लिए अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार शुल्क तय किया गया है। करीब छह वर्षों से व्यापक स्तर पर मुफ्त यूपीआई भुगतान की सुविधा के बाद शुल्क व्यवस्था में प्रस्तावित बदलाव ने डिजिटल भुगतान के भविष्य और उसके आर्थिक ढांचे को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर सरकार डिजिटल भुगतान व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की जरूरत बता रही है, वहीं सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में संभावित उपभोक्ता प्रभाव को प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को सूचीबद्ध किया जाना होगा। अदालत में सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि याचिका में उठाए गए सवालों पर न्यायिक स्तर पर क्या रुख सामने आता है।