यूपीआई एमडीआर विवाद पर वित्त मंत्रालय की दो टूक: 'निर्णय में कोई विदेशी दबाव नहीं, 96% लेन-देन रहेंगे पूरी तरह शुल्क मुक्त
नई दिल्ली। भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस को लेकर पिछले कुछ दिनों से चल रही तरह-तरह की अटकलों और भ्रम पर वित्त मंत्रालय ने पूरी तरह विराम लगा दिया है। ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा व्यापारी लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू करने के फैसले को लेकर उठे सवालों का जवाब देते हुए मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इस नीतिगत निर्णय के पीछे कोई विदेशी प्रभाव नहीं है। भारत अपने डिजिटल इकोसिस्टम से जुड़े फैसले पूरी तरह आत्मनिर्भर और स्वतंत्र रूप से लेता है।
डिजिटल भुगतान के सबसे बड़े माध्यमों में शामिल यूपीआई पर ₹2,000 से अधिक के कुछ व्यापारी लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने के फैसले को लेकर उठे सवालों के बीच वित्त मंत्रालय ने बुधवार को स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय ने कहा कि इस फैसले के पीछे किसी तरह का विदेशी दबाव या प्रभाव नहीं है। भारत अपनी डिजिटल भुगतान नीति से जुड़े फैसले स्वतंत्र रूप से लेता है। सरकार के मुताबिक नए प्रावधान का उद्देश्य डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ, समावेशी और किफायती बनाए रखना है। खास बात यह है कि एमडीआर ग्राहक से वसूला जाने वाला शुल्क नहीं होगा। यह व्यापारी भुगतान से जुड़े इकोसिस्टम में लागू शुल्क है, जिसे बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और यूपीआई एप्लिकेशन से जुड़े अन्य हिस्सेदारों के बीच बांटा जाएगा। नए प्रावधान के अनुसार 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के पात्र पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर इसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन रखी गई है। वहीं पर्सन-टू-पर्सन यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले भुगतान पर किसी भी राशि के लिए एमडीआर नहीं लगेगा। सरकार ने छोटे कारोबारियों को लेकर भी राहत की व्यवस्था स्पष्ट की है। ₹2,000 तक के मर्चेंट भुगतान और छोटे व्यापारियों के लिए पहले से लागू जीरो-एमडीआर व्यवस्था के तहत आने वाले लेन-देन पर शुल्क नहीं लगेगा। मंत्रालय के अनुसार करीब 96 प्रतिशत P2M लेन-देन नए प्रावधान से प्रभावित नहीं होंगे। यूपीआई क्यूआर के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक भुगतान प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को भी नए एमडीआर से छूट जारी रहेगी। इसमें स्ट्रीट वेंडर, मोहल्ले की दुकानें और अन्य छोटे कारोबारी शामिल हैं। कुछ आवश्यक क्षेत्रों के लिए अलग शुल्क व्यवस्था रखी गई है। रेलवे, टेलीकॉम, बीमा और ईंधन जैसे क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर प्रति ट्रांजेक्शन ₹5 का फ्लैट एमडीआर लागू होगा। वहीं म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज और स्टॉकब्रोकर से जुड़े भुगतान पर एमडीआर 0.02 प्रतिशत होगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन निर्धारित की गई है। वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि एमडीआर कोई टैक्स नहीं है और न ही सरकार या भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) इसे अपने पास जमा करेगा। इससे प्राप्त राशि डिजिटल भुगतान के इकोसिस्टम से जुड़े हिस्सेदारों के बीच वितरित होगी। सरकार के अनुसार इसका इस्तेमाल डिजिटल भुगतान ढांचे, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, नवाचार और ग्राहक सेवाओं को मजबूत करने में किया जाना है। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब यूपीआई का इस्तेमाल लगातार बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है। एनपीसीआई के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में यूपीआई पर 24,508.96 मिलियन यानी करीब 24.5 अरब लेन-देन हुए और इनका कुल मूल्य 29.82 लाख करोड़ रुपये रहा। अगस्त में यूपीआई से जुड़े बैंकों की संख्या 752 थी। एमडीआर को लेकर विदेशी दबाव के आरोपों पर सरकार के स्पष्टीकरण के बाद अब बहस का केंद्र इस व्यवस्था के व्यावहारिक असर पर है—खासकर बड़े व्यापारी भुगतान, भुगतान कंपनियों की लागत और डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे की वित्तीय स्थिरता पर। सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था डिजिटल भुगतान तंत्र को टिकाऊ बनाने की दिशा में है, जबकि कारोबारियों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शुल्क का वास्तविक प्रभाव उनके भुगतान इकोसिस्टम पर किस तरह पड़ता है।