जलवायु परिवर्तन का असर: पहाड़ों में समय से पहले खिल गया बुरांश, फरवरी में ही लाल हुए जंगल
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में प्रकृति का मिजाज इस बार कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। आमतौर पर मार्च से अप्रैल के बीच खिलने वाला बुरांश का फूल इस बार जनवरी के बाद से ही जंगलों में अपनी लालिमा बिखेरने लगा है। फरवरी माह में ही पहाड़ों के जंगल बुरांश के चटक लाल फूलों से ढक गए हैं, जो न सिर्फ पर्यटकों बल्कि स्थानीय लोगों को भी हैरान कर रहे हैं। खासतौर पर नैनीताल के जंगलों में बुरांश के फूलों की समय से पहले खिली बहार आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव जलवायु परिवर्तन का सीधा असर है। प्रोफेसर ललित तिवारी बताते हैं कि बुरांश सामान्य रूप से 1700 से 3400 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है और इसके लिए 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। इस वर्ष पहाड़ों में बारिश की कमी और अपेक्षित स्नोफॉल न होने के कारण तापमान में बढ़ोतरी हुई, जिससे बुरांश ने तय समय से करीब दो महीने पहले ही फूल देना शुरू कर दिया। बीते कुछ वर्षों से बुरांश का समय से पहले खिलना लगातार देखा जा रहा है, जो जलवायु असंतुलन की ओर इशारा करता है। बुरांश के फूलों के जल्दी खिलने से जहां जंगलों की खूबसूरती बढ़ी है, वहीं स्थानीय लोगों की चिंताएं भी बढ़ी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मौसम चक्र में इस तरह के बदलाव का असर खेती पर भी पड़ रहा है। फसलों के बुआई और कटाई के समय में बदलाव देखने को मिल रहा है, जिससे भविष्य में उत्पादन प्रभावित हो सकता है। जानकार मानते हैं कि सिर्फ बुरांश ही नहीं, बल्कि सेब, आड़ू और अन्य पर्वतीय फलों पर भी इसका असर पड़ सकता है। औषधीय दृष्टि से बुरांश का फूल बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि बुरांश के फूलों में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं। डॉ. एम.एस. दुग्ताल के अनुसार बुरांश का जूस गर्मियों में शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ ठंडक पहुंचाता है। यह दिल और लिवर को स्वस्थ रखने में भी सहायक होता है। बुरांश में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर से टॉक्सिन और हानिकारक बैक्टीरिया को बाहर निकालने में मदद करते हैं। इसके अलावा यह एंटी-डायबिटिक, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होता है।
बुरांश के फूलों का उपयोग स्क्वॉश, जैम, चटनी और औषधियों के निर्माण में भी किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जलवायु परिवर्तन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में ऐसे बदलाव और गंभीर रूप ले सकते हैं, जिसका असर प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन और कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा।