अपराध बढ़े तो हरकत में सिस्टमः उत्तराखण्ड में ‘ऑपरेशन प्रहार’ का ऐलान! रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के लिए क्यों जरूरी पड़ी हाई लेवल बैठक, क्या ऐसे बदलेंगे हालात?
देहरादून। राजधानी देहरादून में एक के बाद एक आपराधिक घटनाएं होती रहीं और पुलिस मुख्यालय में फाइलें सरकती रहीं। जब मामला हाथ से निकलने लगा, तब जाकर सोमवार को पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ ने हाई लेवल मीटिंग बुलाई और ऑपरेशन प्रहार का ऐलान किया। सवाल यह है कि जो काम पुलिस की रोजमर्रा की ड्यूटी का हिस्सा होना चाहिए था, उसके लिए मुख्यमंत्री के निर्देश और डीजीपी की बैठक क्यों जरूरी पड़ी? देहरादून उत्तराखंड की राजधानी है। यहां पुलिस मुख्यालय है, एसटीएफ है, इंटेलिजेंस विंग है और तमाम थाने हैं। बावजूद इसके शहर में आपराधिक घटनाएं इस हद तक बढ़ीं कि मुख्यमंत्री को दखल देना पड़ा। यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि पुलिस का जमीनी तंत्र या तो सो रहा था या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे हुए था। जिन हॉटस्पॉट इलाकों में अब पुलिस की मौजूदगी बढ़ाने की बात हो रही है, वे इलाके रातोंरात हॉटस्पॉट नहीं बने। यह प्रक्रिया महीनों में होती है।
तो सवाल उठता है कि इतने महीनों तक स्थानीय थाने क्या करते रहे? बैठक में क्षेत्राधिकारियों को कहा गया कि वे खुद फील्ड में जाएं। थाना प्रभारियों को कहा गया कि बैरियर पर ठीक से चेकिंग हो। सुबह के वक्त पुलिसबल सक्रिय रहे। किरायेदारों का सत्यापन हो। यह सब वे काम हैं जो बिना किसी विशेष अभियान के, बिना किसी हाई लेवल मीटिंग के, हर दिन होने चाहिए थे। इन्हें निर्देश के तौर पर देना यह मान लेना है कि ये काम अब तक हो ही नहीं रहे थे। और अगर नहीं हो रहे थे तो जिम्मेदार कौन है? उत्तराखंड पुलिस के इतिहास में ऐसे कई अभियान आए और गए। हर बार एक नया नाम, एक नई बैठक, एक नया संकल्प। कुछ हफ्ते चहल-पहल रहती है, मीडिया में खबरें आती हैं, फिर सब पहले जैसा हो जाता है। ऑपरेशन प्रहार के साथ भी यही खतरा है। जब तक ऊपर से नजर है, नीचे हलचल रहेगी। जैसे ही मीडिया का ध्यान हटा और डीजीपी की नजर दूसरी तरफ गई, हालात वापस वहीं लौट आएंगे जहां से शुरू हुए थे। क्योंकि समस्या ऑपरेशन की कमी नहीं है, समस्या जवाबदेही की संस्कृति की कमी है।
बैठक में किरायेदारों, पीजी और होम-स्टे के सत्यापन पर जोर दिया गया। यह जरूरी काम है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन अनुभव बताता है कि ऐसे अभियानों में अक्सर आम और कमजोर तबके के लोग, बाहर से आए मजदूर, छात्र, छोटे कारोबारी सबसे ज्यादा परेशान होते हैं। जबकि असली आपराधिक तत्व, जिनके पास पैसा और पहुंच है, इस जाल से आसानी से बच निकलते हैं। निर्देश दिया गया कि तय समय के बाद चलने वाले बार और पब्स पर सख्ती हो। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन जो प्रतिष्ठान महीनों से नियम तोड़ रहे थे, वे क्या पुलिस की जानकारी के बिना चल रहे थे? अगर जानकारी थी तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? और अगर नहीं थी तो इंटेलिजेंस तंत्र किस काम का?