Sep 05, 2026 Login

मर गई मानवता: मां की लाश के बगल में रोती बच्ची, जमीन पर बैठे पिता! पैसे की तंगी में नहीं मिली एंबुलेंस, झकझोर देने वाली कहानी

Humanity dies: A little girl weeping beside her mother's body, the father sitting on the ground! No ambulance available due to a lack of funds—a heart-wrenching story.

झांसी। यूं तो सरकारें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और हर तबके के विकास के दावे करती हैं, लेकिन यूपी के झांसी से सामने आई एक तस्वीर इन दावों को बिल्कुल धंुधला कर दिया है। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में एक गरीब परिवार को अपनी मृत पत्नी और मां के शव को घर ले जाने के लिए घंटों मदद का इंतजार करना पड़ा। पैसे के अभाव में पति अपनी पत्नी का शव स्ट्रेचर पर रखकर मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में बैठा रहा, जबकि करीब 8 साल की मासूम बेटी अपनी मां के शव के पास बैठकर रोती रही। बारिश के बीच सामने आई यह तस्वीर व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रही है। मामला मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी के पास बनी पार्किंग का बताया जा रहा है। मध्य प्रदेश के ओरछा निवासी राहुल आदिवासी अपनी बीमार पत्नी रामवती का इलाज कराने के लिए पहले ओरछा अस्पताल पहुंचे थे। पत्नी की हालत गंभीर होने पर डॉक्टरों ने उन्हें झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। राहुल के साथ उनकी करीब आठ साल की बेटी नंदनी भी थी। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद वह पत्नी को बेहतर इलाज की उम्मीद में झांसी लेकर पहुंचे। राहुल के मुताबिक, ओरछा अस्पताल में डॉक्टर ने उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए मदद की और पैसे देकर टैक्सी की व्यवस्था कर उन्हें झांसी मेडिकल कॉलेज भेजा गया। परिवार किसी तरह मेडिकल कॉलेज पहुंचा, लेकिन यहां डॉक्टरों ने रामवती को मृत घोषित कर दिया। पत्नी की मौत के बाद राहुल के सामने इलाज से भी बड़ी समस्या खड़ी हो गई, वो थी अब शव को घर कैसे ले जाया जाए? राहुल के पास शव को घर तक ले जाने के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में वह पत्नी के शव को स्ट्रेचर पर रखकर मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में बैठ गया। बताया जा रहा है कि वह एक घंटे से ज्यादा समय तक मदद का इंतजार करता रहा। इस दौरान बारिश भी होती रही। एक तरफ स्ट्रेचर पर पत्नी का शव पड़ा था और दूसरी तरफ मासूम बेटी अपनी मां के पास बैठी रोती रही। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे मार्मिक तस्वीर राहुल की आठ साल की बेटी नंदनी की रही। मां की मौत का गम झेल रही बच्ची को शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि परिवार के सामने अब शव को घर ले जाने जैसी मुश्किल भी खड़ी है। वह अपनी मां के शव के पास बैठी रही और रोती रही। बारिश के बीच मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में स्ट्रेचर पर रखा शव, उसके पास बैठी मासूम बच्ची और आर्थिक मजबूरी से जूझता पति, इस दृश्य ने स्वास्थ्य व्यवस्था और गरीबों के लिए उपलब्ध सहायता व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। इस दौरान एक और तस्वीर ने लोगों को झकझोर दिया। रामवती के शव के पैरों के पास एक कुत्ते का बच्चा बैठा हुआ दिखाई दिया। इंसान अपने ही परिजन के शव को घर ले जाने में असमर्थ था और मदद की आस में पार्किंग में बैठा था। यह पूरा घटनाक्रम सिस्टम की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करने वाला रहा।

बताया गया कि बारिश बंद होने के बाद मेडिकल कॉलेज चौकी में तैनात सिपाही अजय बाहर आया। उसकी नजर पार्किंग में स्ट्रेचर पर रखे शव और उसके पास बैठे परिवार पर पड़ी। परिवार की स्थिति देखकर सिपाही ने तत्काल एंबुलेंस बुलाने की व्यवस्था की। इसके बाद रामवती के शव को एंबुलेंस के जरिए उनके घर भिजवाया गया। जिस मदद का राहुल काफी देर से इंतजार कर रहा था, वह आखिरकार पुलिस चौकी के सिपाही की नजर पड़ने के बाद मिल सकी। मामले को लेकर मेडिकल कॉलेज के सीएमएस सचिन माहौर से भी बात की गई। उनका कहना है कि मेडिकल कॉलेज में किसी मरीज की मौत होने के बाद यदि परिजन शव वाहन की मांग करते हैं तो वाहन उपलब्ध कराया जाता है। सीएमएस के मुताबिक, संभव है कि डॉक्टरों ने शव परिजनों को सौंप दिया हो, लेकिन परिवार की ओर से शव वाहन की जरूरत के बारे में जानकारी नहीं दी गई हो। हालांकि, प्रशासन ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए मामले की जांच कराने की बात कही है। अब सवाल यह है कि अगर शव वाहन की सुविधा उपलब्ध है तो आर्थिक रूप से कमजोर इस परिवार को पत्नी के शव के साथ मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में इतनी देर तक क्यों बैठना पड़ा?

यह घटना सिर्फ एक परिवार की मजबूरी की कहानी नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। अगर मेडिकल कॉलेज में शव वाहन की व्यवस्था है, तो क्या जरूरतमंद परिवारों को इसके लिए अलग से जानकारी मांगनी होगी? क्या अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ इलाज और मृत्यु प्रमाणित करने तक सीमित है, या ऐसे परिवारों को अंतिम यात्रा के लिए भी सहायता उपलब्ध कराना व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए? राहुल आदिवासी के पास पैसे नहीं थे, लेकिन उनके सामने पत्नी का शव था। उनके साथ एक छोटी बच्ची थी, जो अपनी मां को खो चुकी थी। ऐसे समय में एक गरीब परिवार को सिस्टम से सिर्फ संवेदनशीलता और मदद की उम्मीद होती है। इस घटना में अंततः एंबुलेंस की व्यवस्था हो गई और परिवार शव को घर ले जा सका, लेकिन उससे पहले जिस तरह एक पति को अपनी पत्नी के शव के साथ बारिश में बैठकर मदद का इंतजार करना पड़ा, उसने सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों और उनकी जमीनी पहुंच के बीच का अंतर जरूर सामने ला दिया है।