उत्तराखंड के बीएड कॉलेजों की शिक्षा व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त! दो बार मौका मिलने के बावजूद सरकार ने नहीं दाखिल किया जवाब, दो सप्ताह में शपथपत्र पेश करने के दिए निर्देश

High Court takes a tough stance on the education system of B.Ed. colleges in Uttarakhand! Despite being granted two opportunities, the government failed to file a response; directed to submit an affi

नैनीताल। उत्तराखंड ने प्रदेश के सरकारी बीएड कॉलेजों व संबंधित विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त उच्च शिक्षा देने वाले कालेजों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में राज्य सरकार को पहले भी दो बार कोर्ट ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिए जाने के बाद भी अभी तक जवाब पेश न करने पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की है। कोर्ट ने सरकार को अतिरिक्त समय देते हुए दो सप्ताह में अपना शपथपत्र देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई हेतु मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ती सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने दो सप्ताह बाद की तिथि नियत की है। बीते कल हुई सुनवाई पर याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि दो वर्ष बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के संबंध में कोई हलफनामा कोर्ट में पेश नही किया है। ऊपर से सरकार हर साल मान्यता प्राप्त कालेजों का संचालन का कार्यकाल बढ़ा रही है। जबकि कालेजों में न शिक्षक हैं, न ही पढ़ने वाले छात्रों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध हैं। कालेज हर साल छात्रों से कोर्स के नाम पर कई गुना फीस वसूल कर रहे हैं। उसके मुताबिक उन्हें कोई सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। बता दें कि पिथौरागढ़ निवासी अधिवक्ता डाक्टर राजेश पांडे ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि छात्र-छात्राओं से पूरा शुल्क लिया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद कई बीएड कॉलेजों में आवश्यक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है। जिसकी वजह से प्रदेश का शिक्षा स्तर हर वर्ष गिर रहा है। याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जारी दिशा निर्देशों का अवलोकन कोर्ट को कराया। जिसमें शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि उचित प्रशिक्षण और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के बिना तैयार हुए शिक्षक प्रभावी शिक्षण कार्य नहीं कर सकते और इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि उच्च शिक्षा और शिक्षक शिक्षा से जुड़े कई निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है।