हल्द्वानी बनभूलपुरा रेलवे भूमि मामला: सुप्रीम कोर्ट में CJI की सख्त टिप्पणी, सार्वजनिक भूमि पर कब्जा मालिकाना हक नहीं, पुनर्वास पर तीखी बहस

Haldwani Banbhulpura Railway Land Case: CJI's strong remarks in Supreme Court, occupation of public land is not ownership right, heated debate on rehabilitation

हल्द्वानी/नई दिल्ली। हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण प्रकरण की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रेलवे और उत्तराखंड सरकार ने अपना हलफनामा पेश करते हुए भूमि स्वामित्व, मुआवजा और पुनर्वास से जुड़े बिंदुओं पर विस्तार से पक्ष रखा।

सुनवाई के दौरान रेलवे ने अदालत को बताया कि बनभूलपुरा क्षेत्र में लगभग 30 हेक्टेयर भूमि रेलवे की संपत्ति है, जिस पर करीब 3660 मकान और 5236 परिवारों के रहने का दावा है। रेलवे का कहना है कि यह सार्वजनिक भूमि है और उस पर अनधिकृत कब्जा किया गया। अदालत में यह भी कहा गया कि केवल लंबे समय तक रहने से किसी को मालिकाना हक प्राप्त नहीं हो जाता। रेलवे ने 13 मामलों में भूमि को फ्रीहोल्ड श्रेणी में स्वीकार करते हुए उन मामलों में मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही राज्य सरकार की ओर से हटाए गए लोगों के लिए वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया गया। रेलवे ने पुनर्स्थापन की मांग वाली याचिका को खारिज करने का अनुरोध भी किया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत  ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी की कि सार्वजनिक भूमि पर अनाधिकृत कब्जा किसी भी स्थिति में वैध मालिकाना हक का आधार नहीं बन सकता। उन्होंने यह भी कहा कि प्रभावित लोगों की संख्या 50 हजार बताई जा रही है, लेकिन व्यक्तियों और परिवारों की वास्तविक संख्या में अंतर हो सकता है, इसलिए तथ्यों को स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना आवश्यक है। अदालत ने यह संकेत दिया कि कानून और मानवीय दृष्टिकोण—दोनों पहलुओं को संतुलित तरीके से देखा जाएगा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता  प्रशांत भूषण ने दलील दी कि प्रभावित लोगों की संख्या 50 हजार से अधिक है और उनमें से बहुत कम परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना की पात्रता में आते हैं। उन्होंने कहा कि शेष परिवारों के पुनर्वास की स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए। भूषण ने यह भी तर्क रखा कि संबंधित भूमि राज्य सरकार की है और लोग वर्षों से वहां निवास कर रहे हैं, ऐसे में नियमितिकरण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने कोविड काल के दौरान पारित एकपक्षीय आदेशों का भी उल्लेख किया और बताया कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत आदेश जारी कर आगे की प्रक्रिया तय की थी।

मामले की पृष्ठभूमि में वर्ष 2022 में उत्तराखंड हाइकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद प्रभावित पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए थे। इसके बाद फरवरी और मार्च 2023 में पुनर्वास और मानवीय पहलुओं पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई। वर्ष 2024 और 2025 में भी इस मामले में कई बार सुनवाई टली, आज हुई सुनवाई के बाद ये मामला 19 मार्च के बाद फिर सुना जाएगा,तब तक के लिए सुनवाई टल गई है।

इधर प्रशासन ने भी स्थिति को संवेदनशील मानते हुए सतर्कता बढ़ा दी है। नैनीताल के एसएसपी मंजूनाथ टीसी ने कहा है कि पुलिस का उद्देश्य केवल शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखना है और किसी भी प्रकार की अफवाह या उकसावे पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो न केवल भूमि स्वामित्व के प्रश्न को स्पष्ट करेगा बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य की दिशा भी तय करेगा।