संपादक की कलम सेः उत्तराखंड में न्याय क्यों डरता है?
-सुनील मेहता-
उत्तराखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सवाल किसी एक घटना का नहीं, बल्कि पूरे शासन तंत्र की आत्मा का है। पिछले कुछ समय में सामने आई कई घटनाएं जिनमें उत्तराखंड पुलिस और सत्ता का गठजोड़ देखा जा सकता है दो दिन पहले एक किसान का फेसबुक लाइव और उसके बाद पुलिस प्रताड़ना के चलते आत्महत्या, एक महिला पुलिसकर्मी का वर्षों तक यौन शोषण और आज तक कार्रवाही के नाम पर लीपापोती, एक आरटीआई कार्यकर्ता को कुचलने के लिए आईपीएस अधिकारी द्वारा की गई बर्बरता और टिहरी पुलिस पर युवक को नग्न कर पीटने और मूत्र पिलाने जैसे कुत्य अलग-अलग प्रतीत होती हैं, लेकिन इनके भीतर एक ही सच्चाई छिपी है। सत्ता संरक्षित पुलिस तंत्र, जवाबदेही का अभाव और जनता के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं का खोखला होता विश्वास आज उत्तराखंड की सच्चाई बन चुका है।
किसान की मौत ने सिस्टम को कठघरे में खड़ा किया
हल्द्वानी के होटल में आत्महत्या करने वाला किसान सुखवंत सिंह केवल अपनी जान नहीं दे रहा था, वह मरने से पहले पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर रहा था। फेसबुक लाइव पर लगाए गए आरोप किसी भावनात्मक उन्माद का परिणाम नहीं थे, बल्कि वर्षों की प्रताड़ना, आर्थिक धोखाधड़ी और पुलिसिया उपेक्षा का विस्फोट थे। जब कोई नागरिक यह मान ले कि उसकी शिकायत थाने, एसपी कार्यालय और शासन तक पहुंचकर भी निष्प्रभावी है, तो आत्महत्या व्यक्तिगत निर्णय नहीं रह जाती, वह संस्थागत असफलता का प्रमाण बन जाती है। उत्तराखंड पुलिस और राज्य सरकार इस मौत को केवल “जांच का विषय” कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं है। सुखवंत ने लाइव वीडियो में साफ कहा कि उन्होंने शिकायतें पुलिस थाने और ऊधम सिंह नगर प्रशासन तक दी थीं, लेकिन वहां कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने उधम सिंह नगर के एसएसपी मणिकांत मिश्रा समेत कई पुलिस अधिकारियों के नाम भी लिए और आरोप लगाया कि उनकी शिकायतों पर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। आईटीआई कोतवाली के प्रभारी, उपनिरीक्षक कुंदन सिंह रौतेला को एसएसपी मणिकान्त मिश्रा का भरपूर सहयोग, जिस वजह से बागेश्वर जिले से अटैचमेंट में काशीपुर लाए गए थे, लेकिन वे बागेश्वर का वेतन वहीं से प्राप्त कर रहे है। यह तथ्य सिर्फ प्रशासनिक अनियमितता ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड पुलिस में सिस्टमिक असंतुलन और जवाबदेही की कमी की तरफ इशारा करता है, जहां एक पुलिसकर्मी दो जिलों से अलग-अलग जिम्मेदारियों और वेतन से जुड़ा हुआ नजर आता है और किसानों की शिकायतों पर वसूली और दबाव की बजाय कार्रवाई करने की बजाय उपेक्षा बरतता है। सुखवंत ने एफबी लाइव में यह भी कहा कि उसने चार महीने तक निरंतर पुलिस थानों आईटीआई, पैगा चौकी और अन्य उच्च अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन पुलिस अधिकारियों ने न केवल उसकी बात सुनी, बल्कि कई बार उल्टा गालियां दीं। इस निराशा और मानसिक दबाव के कारण ही उन्होंने वह कदम उठाया। यह कोई मामूली मनोवैज्ञानिक स्थिति नहीं थी। यह वह स्थिति थी जिसमें एक आम किसान ने खुद को आखिरकार गोली मार ली, फेसबुक पर लाइव रहते हुए, केवल इसलिए कि उसने माना कि कोई भी उसकी परेशानी को गंभीरता से नहीं ले रहा। मामले में राजनीतिक प्रशासनिक प्रतिक्रिया अनिवार्य रूप से औपचारिक रही। हांलाकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मजिस्ट्रेट जांच के निर्देश जारी किए और कुमाऊं कमिश्नर को मामले की पूरी जांच सौंप दी।
केशव थलवाल और टिहरी पुलिसः खाकी जब कानून नहीं, डर बन जाए
टिहरी से सामने आया केशव थलवाल का मामला कोई साधारण विवाद नहीं है, बल्कि यह उस खतरनाक मानसिकता को उजागर करता है जिसमें पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझने लगती है। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में केशव थलवाल ने टिहरी पुलिस पर जिस तरह के आरोप लगाए हैं, वे अगर आधे भी सच हैं, तो यह उत्तराखंड पुलिस के इतिहास पर एक गहरा धब्बा है। केशव थलवाल का आरोप है कि उन्हें पुलिस ने जबरन उठाया, चौकी में बंद किया, नग्न कर पीटा और अमानवीय व्यवहार किया। ऐसा व्यवहार किसी अपराधी पर नहीं, बल्कि एक नागरिक के साथ किया गया और यही इस पूरे प्रकरण को बेहद गंभीर बनाता है। सवाल यह नहीं है कि केशव थलवाल के खिलाफ पहले कोई शिकायत थी या नहीं, सवाल यह है कि क्या पुलिस को किसी भी परिस्थिति में कानून हाथ में लेने का अधिकार है? पुलिस का तर्क हमेशा की तरह वही पुराना है, “व्यक्ति विवादित है”, “पहले से मुकदमे हैं”, “पुलिस को बदनाम किया जा रहा है।” लेकिन लोकतंत्र में यह तर्क अमान्य है। कानून यह नहीं कहता कि अगर किसी व्यक्ति की छवि अच्छी नहीं है तो उसे पीटा जा सकता है, अपमानित किया जा सकता है या उसकी गरिमा कुचली जा सकती है। इन सभी मामलों में एक साझा तत्व है राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण। सरकार बार बार कानून व्यवस्था की दुहाई देती है, लेकिन कानून तब अर्थहीन हो जाता है जब वह चुनिंदा लोगों पर लागू हो। जब आरोपी वर्दी में हो, तब जांच धीमी हो जाती ह, जब आरोपी सत्ता के करीब हो, तब फाइलें अटक जाती हैं। यह दोहरा मापदंड ही जनता के अविश्वास की जड़ है। उत्तराखंड एक छोटा राज्य है, यहां सत्ता और प्रशासन के चेहरे छिपते नहीं हैं। इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि सरकार उदाहरण प्रस्तुत करे। लेकिन यहां उदाहरण उलटे दिए जा रहे है। ऐसे उदाहरण जो बताते हैं कि ताकतवर होने पर जवाबदेही से बचा जा सकता है। यह प्रवृत्ति केवल पुलिस या सरकार को नहीं, बल्कि समाज को भीतर से कमजोर करती है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों के विश्वास से चलता है। जब नागरिक यह मानने लगें कि न्याय केवल अदालतों में वर्षों बाद मिलेगा, या शायद मिलेगा ही नहीं, तब लोकतंत्र खोखला हो जाता है। उत्तराखंड आज उसी दिशा में बढ़ रहा है।
जब आईपीएस अधिकारी भूले मर्यादा, आरटीआई कार्यकर्ता को पीटा
पिथौरागढ़ में एक आरटीआई कार्यकर्ता को तत्कालीन एसपी लोकेश्वर सिंह द्वारा कथित रूप से निर्वस्त्र कर पीटा गया, उत्तराखंड पुलिस के नैतिक पतन का सबसे नग्न उदाहरण है। यह मामला इसलिए अलग नहीं है कि इसमें आरोपी एक आईपीएस अधिकारी है, बल्कि इसलिए कि इस आरोप को राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने जांच के बाद सिद्ध माना है। यह कोई सोशल मीडिया आरोप नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संस्था का निष्कर्ष है। इसके बावजूद सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई का अभाव यह संकेत देता है कि सत्ता के लिए संस्थागत सच्चाई से अधिक महत्वपूर्ण “असुविधाजनक चेहरों” को हटाना है। लोकेश्वर सिंह पर दोष साबित होना इस मामले का समाधान नहीं है। न्याय तब होता है जब कानून के अनुसार दंड तय हो। यदि कोई अधिकारी पद छोड़कर अंतरराष्ट्रीय संस्था में नौकरी पा ले और उसके खिलाफ सिद्ध आरोपों पर राज्य मौन साध ले, तो यह न केवल पीड़ित के साथ अन्याय है, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल है।
जब आरोपी सिस्टम हो, तब पीड़ित कहां जाए? महिला एसआई को आज तक नहीं मिला न्याय
उत्तराखंड पुलिस तंत्र के भीतर कार्यरत एक महिला एएसआई की कहानी और भी भयावह है। एक महिला, जो कानून की रक्षा के लिए वर्दी पहनती है, वही महिला अपने ही विभाग में आठ वर्षों तक न्याय के लिए भटकती रही। आरोप किसी बाहरी अपराधी पर नहीं, बल्कि विभाग के भीतर शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति पर हैं। जांच समितियां बनती रहीं, महिला आयोग ने आपत्तियां दर्ज कीं, जिलाधिकारी स्तर की जांच में घटना को आपत्तिजनक माना गया, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज न होना यह दर्शाता है कि उत्तराखंड पुलिस के लिए कानून समान नहीं है। और उसके बाद तमाम दबाव जीरो एफआईआर दर्ज करना और और कई महीनों तक आरोपी के विरुद्ध कार्रवाही न करना सीधे तौर पर यह बताता है की पुलिस विभाग में उच्च पदांे पर बैठे अधिकारियों को एक तरह से विभाग के अंदर ही उत्पीड़न करने का लाइसेन्स प्राप्त है।