उत्तराखंड कोल पावर प्लांट पर घमासान: कांग्रेस ने दिल्ली में प्रेस वार्ता कर लगाए टेंडर शर्तों में भारी हेरफेर के आरोप, सरकार ने खारिज किए दावे
नई दिल्ली। उत्तराखंड में 1320 मेगावाट के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट की निविदा प्रक्रिया को लेकर सियासत चरम पर पहुंच गई है। कांग्रेस ने नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय प्रेस वार्ता आयोजित कर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का दावा है कि निजी उद्योग समूह अडानी पावर को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किया गया। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि सभी संशोधन तकनीकी परीक्षण और नियामक आयोग की मंजूरी के बाद ही लागू किए गए हैं।
उत्तराखंड में 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालिक खरीद को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर निविदा प्रक्रिया में बदलाव के गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने दावा किया कि निविदा की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किए गए, जिससे अदाणी पावर के लिए रास्ता आसान हुआ। सरकार की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि निविदा शर्तों में आवश्यक बदलाव तकनीकी और व्यावहारिक आधार पर किए गए तथा इन्हें उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग के समक्ष रखा गया था। मामले की पृष्ठभूमि में उत्तराखंड की बिजली जरूरतें हैं। 25 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में को यूपीसीएल अदाणी पावर से 25 वर्षों तक 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में दर 5.746 रुपये प्रति यूनिट तय हुई है। प्रस्तावित बिजली छत्तीसगढ़ में स्थापित होने वाले संयंत्र से उत्तराखंड को मिलने वाली है। कांग्रेस का आरोप है कि मूल निविदा प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। पवन खेड़ा ने दावा किया कि परियोजना को उत्तराखंड में ही स्थापित करने की बाध्यता हटाकर देश में कहीं भी स्थापित करने की अनुमति दी गई। कांग्रेस ने एक ही बोलीदाता से 1320 मेगावाट बिजली की आपूर्ति, निर्माण अवधि और टैरिफ से जुड़े प्रावधानों में बदलाव पर भी सवाल उठाए। पार्टी का दावा है कि इन बदलावों से उपभोक्ताओं पर दीर्घकालिक वित्तीय बोझ बढ़ सकता है। कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि पहले सार्वजनिक क्षेत्र की संयुक्त परियोजना के जरिए बिजली उत्पादन की योजना पर विचार क्यों किया गया और बाद में उसे समाप्त कर निजी कंपनी से दीर्घकालिक बिजली खरीद का रास्ता क्यों अपनाया गया। पार्टी ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और आर्थिक प्रभाव को सार्वजनिक करने की मांग की है। वहीं, सरकार का पक्ष इससे अलग है। प्रमुख सचिव ऊर्जा डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम के अनुसार भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय का 2019 का मॉडल बिडिंग दस्तावेज़ एक सामान्य मॉडल दस्तावेज है। प्रत्येक परियोजना की तकनीक, स्थान, ईंधन की उपलब्धता और परिवहन लागत अलग होती है। इसलिए बोलीदाताओं से प्राप्त सुझावों और आपत्तियों का तकनीकी तथा व्यावहारिक परीक्षण किया गया। सरकार के अनुसार प्रस्तावित संशोधनों को यूईआरसी के सामने रखा गया और आयोग ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद आवश्यक बदलावों को मंजूरी दी। यूईआरसी के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी 1320 मेगावाट आरटीसी कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालिक खरीद से संबंधित आवेदन और RFP/PSA की विशिष्ट धाराओं में संशोधन से जुड़ी कार्यवाही दर्ज है। आयोग ने 8 जुलाई 2026 को 1320 मेगावाट की दीर्घकालिक खरीद के क्वांटम से संबंधित आवेदन पर आदेश दर्ज किया था।सरकार ने करार को राज्य की ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा है कि उत्तराखंड की बिजली व्यवस्था जलविद्युत पर काफी निर्भर है और मौसमी बदलावों के कारण आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। 1320 मेगावाट की दीर्घकालिक खरीद को इसी संदर्भ में स्थिर आपूर्ति के विकल्प के तौर पर बताया गया है। अब राजनीतिक विवाद का केंद्र दो सवाल हैंनिविदा की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी और 25 वर्षों के इस बिजली खरीद समझौते का वास्तविक आर्थिक प्रभाव क्या होगा। कांग्रेस के आरोप और सरकार का स्पष्टीकरण दोनों सामने हैं। अंतिम तस्वीर निविदा दस्तावेजों, नियामक आयोग के आदेशों और करार की वास्तविक वित्तीय शर्तों के विस्तृत परीक्षण से ही स्पष्ट होगी।