दिल्ली दंगा मामलाः जेल में ही रहेंगे उमर खालिद और शरजील इमाम! सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली जमानत, 5 अन्य आरोपियों को मिली बेल

Delhi riots case: Umar Khalid and Sharjeel Imam remain in jail! Supreme Court denies bail, 5 other accused granted bail

नई दिल्ली। दिल्ली दंगा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने माना है कि दोनों ही आरोपियों पर जो आरोप लगे हैं, वो ना सिर्फ अलग हैं बल्कि गंभीर भी हैं। यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच द्वारा सुनाया गया। वहीं सर्वोच्च अदालत ने पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी है। जमानत पाने वाले पांच आरोपियों के नाम गुलफिशा, मिरान, सलीम, शिफा और शादाब हैं। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने उचित आधारों पर फैसला दिया था, लेकिन लंबे समय से जेल में रहने का सवाल है। सिर्फ देरी के आधार पर ऐसे मामलों में छूट नहीं दी जा सकती। विभिन्न पहलुओं पर गौर करना जरूरी है। देश की सुरक्षा का सवाल भी है, जिसे ध्यान रखा जाना जरूरी है। मुकदमे विशेष कानून के तहत दर्ज किए गए हैं जो संसद में खास स्थितियों के लिए बनाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये अपीलें हाईकोर्ट द्वारा जमानत नामंजूर किए गए सामान्य निर्णय के विरुद्ध दायर की गई हैं। लंबे समय तक कारावास और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के संबंध में तर्क प्रस्तुत किए गए थे।

यह न्यायालय संविधान और कानून के बीच तुलना करने में संलग्न नहीं है। अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में केंद्रीय स्थान रखता है। मुकदमे से पहले की कैद को सजा का दर्जा नहीं दिया जा सकता। स्वतंत्रता का हनन मनमाना नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेष कानून के रूप में यूएपीए मुकदमे से पहले के चरण में जमानत दिए जाने की शर्तों के संबंध में विधायी निर्णय प्रस्तुत करता है। यूएपीए की धारा 43डी(5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है। यह न्यायिक जांच को बाहर नहीं करता है या डिफॉल्ट में जमानत से इनकार को अनिवार्य नहीं बनाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में देरी से न्यायिक जांच में और अधिक गहनता आने का खतरा बढ़ जाता है। यूएपीए की धारा 43डी(5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है। यह न्यायिक जांच को बाहर नहीं करता है या डिफ़ॉल्ट होने पर जमानत से इनकार को अनिवार्य नहीं बनाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों को मारने या विनाश के अलावा, यह प्रावधान उन कृत्यों को भी शामिल करता है जो सेवाओं को बाधित करते हैं और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करते हैं। कानून के तहत आतंकवादी कृत्य में न सिर्फ हिंसा बल्कि ज़रूरी सेवाओं में बाधा डालना भी शामिल है। कोर्ट को यह जांच करनी होगी कि क्या लगातार हिरासत में रखने से कोई मकसद पूरा होता है।