Sep 29, 2026 Login

जनगणना 2026: हर नागरिक का सम्मान और सटीक डेटा, संवेदनशील सवालों के लिए तैयार हो रहे 34 लाख प्रगणक

Census 2026: Respect for every citizen and accurate data—3.4 million enumerators are preparing for sensitive questions.

नई दिल्ली। भारत की आगामी राष्ट्रव्यापी जनगणना 2026 केवल आंकड़ों का एक विशाल संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को समझने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अभियान है। इस बार जनगणना का स्वरूप ऐतिहासिक होने जा रहा है, क्योंकि आजादी के बाद पहली बार आधिकारिक आंकड़ों में जातीय संरचना का विस्तृत रिकॉर्ड भी दर्ज किया जाएगा। आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा जैसे राज्यों में जनगणना का दूसरा चरण तय समय से पहले 5 दिसंबर से ही शुरू होने जा रहा है। ऐसे में इस वृहद अभ्यास की सफलता, पारदर्शिता और नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार और जनगणना आयोग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

देश की आगामी जनगणना 2027 केवल आबादी की गिनती तक सीमित नहीं रहने वाली है। इस बार जनसंख्या गणना में जाति सहित कई सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय पहलुओं की जानकारी दर्ज की जाएगी। ऐसे में जनगणना कर्मियों को संवेदनशील सवाल पूछने और नागरिकों के जवाब सही तरीके से दर्ज करने की विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है। खास तौर पर जाति, धर्म, लिंग, विवाह, संतान, प्रजनन क्षमता, दिव्यांगता, प्रवासन और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े सवालों को पूछते समय सम्मानजनक संवाद और निष्पक्षता पर जोर दिया गया है। भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण ने राज्यों को भेजे निर्देशों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता को जनगणना की सटीकता, पूर्णता और विश्वसनीयता से जोड़ा है। करीब 34 लाख प्रगणकों और पर्यवेक्षकों को इस व्यापक अभियान के लिए प्रशिक्षित किया जाना है। निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि नागरिकों से जानकारी लेते समय किसी तरह की धारणा, पूर्वाग्रह या व्यक्तिगत राय को प्रक्रिया में जगह नहीं मिलनी चाहिए। उत्तरदाता जो जानकारी दे, उसे उसी रूप में दर्ज करना और संवेदनशील प्रश्नों के दौरान बहस या टिप्पणी से बचना जरूरी होगा। जनसंख्या गणना के दूसरे चरण की अधिसूचित प्रश्नावली में प्रत्येक व्यक्ति से नाम, परिवार में संबंध, लिंग, आयु, वैवाहिक स्थिति, धर्म, अनुसूचित जाति/जनजाति और जाति से जुड़ी जानकारी ली जाएगी। इसके अलावा मातृभाषा, अन्य भाषाओं का ज्ञान, साक्षरता और शिक्षा, दिव्यांगता, आर्थिक गतिविधि, रोजगार, प्रवासन और उसके कारण तथा महिलाओं से संबंधित प्रजनन संबंधी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। जाति की जानकारी इस जनगणना की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। सरकार ने जनगणना 2027 में जातियों की गणना को शामिल करने का निर्णय लिया है। इससे सामाजिक संरचना से जुड़ा विस्तृत आधिकारिक आंकड़ा तैयार होगा। यही वजह है कि जाति संबंधी प्रश्न पूछने के तरीके को लेकर कर्मियों को विशेष रूप से संवेदनशील बनाया जा रहा है। आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड के गैर-बर्फीले क्षेत्रों में जनसंख्या गणना का चरण निर्धारित समय से पहले कराया जा रहा है। वहीं बर्फबारी वाले क्षेत्रों के लिए अलग समय-सारिणी तय की गई है। जनगणना 2027 के सामान्य चरण में जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में प्रस्तावित है, जबकि उत्तराखंड के बर्फबारी वाले क्षेत्रों सहित कुछ हिमालयी क्षेत्रों में असमकालिक कार्यक्रम के तहत गणना पहले कराई जा रही है।उत्तराखंड में दूसरे चरण की तैयारियां भी तेज हैं। गृह मंत्रालय के अधीन जनगणना कार्य निदेशालय ने जिला और नगर निगम स्तर के अधिकारियों के लिए सितंबर में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें चार्ज अधिकारी, अतिरिक्त चार्ज अधिकारी, जनगणना लिपिक और तकनीकी सहायकों को प्रक्रिया और निर्धारित मानकों के अनुरूप काम करने का प्रशिक्षण दिया गया। ऊधम सिंह नगर समेत कई जिलों में भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए।जनगणना 2027 देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी। आंकड़े मोबाइल एप के माध्यम से दर्ज किए जाएंगे और नागरिकों को स्वयं जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सेल्फ-एन्यूमरेशन की सुविधा भी दी गई है। प्रशिक्षण के लिए बहु-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है, ताकि फील्ड में काम करने वाले कर्मियों को प्रश्नावली, तकनीक और संवेदनशील सवालों से निपटने की स्पष्ट जानकारी मिल सके। जनगणना प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था के जरिए प्रशिक्षण की प्रगति पर नजर रखी जा रही है। मूल लक्ष्य यही है कि देश के हर घर और हर व्यक्ति से जुटाई जाने वाली जानकारी एक समान प्रक्रिया के तहत दर्ज हो। खास तौर पर संवेदनशील सामाजिक सवालों में एक छोटी सी गलती भी आंकड़ों की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस बार जनगणना कर्मियों की ट्रेनिंग को केवल तकनीकी अभ्यास नहीं, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और निष्पक्ष रिकॉर्डिंग की कसौटी के रूप में देखा जा रहा है।