प्राइवेट कंपनियों पर करम,BSNL पर सितम:हजारों का कर्ज़ा झेल रहा BSNL और लाखों का फायदा ले जा रहा रिलाएंस!अब 5G भी जिओ के हवाले!BSNL अब तक नही कर पाया 4G लांच
India:2/10/2022
भारत एक ऐसा देश है जहाँ सरकारी संस्थाओ से ज़्यादा प्राइवेट संस्थाएं ज़्यादा तरक्की कर रही है। प्राइवेट टेलिकॉम कम्पनियों ने पिछले 5 सालों में मुनाफ़ा ही मुनाफा कमाया है,जबकि बीएसएनएल पिछले दस सालो से घाटे में चल रहा है।
टेलिकॉम कंपनी बीएसएनएल BSNL उस दौर में आई थी, जब पूरे गांव या मोहल्लों में एक फोन हुआ करता था। एक मिनट की कॉल घड़ी देखकर की जाती थी। लोगों को लैंडलाइन और टेलीफोन बूथ के झंझट से मुक्ति दिलाने वाली ये कंपनी अब खुद राहत पैकेज पर जिंदा है। एक दशक से भी ज्यादा वक्त से कंपनी लगातार घाटे में चल रही और हर दिन पिछड़ रही है। सवाल है कि BSNL की इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन है।
आइये शुरुआत से एक नजर डालते है बीएसएनएल BSNL पर।
एक अक्टूबर 2000 में संचार के क्षेत्र में क्रांति आयी और बीएसएनएल यानी भारत संचार निगम लिमिटेड BSNL की शुरुआत हुई। लॉन्च के कुछ समय बाद ही बीएसएनएल देश की नंबर एक मोबाइल सेवा बन गई थी। एमटीएनएल मुंबई और दिल्ली में अपनी सेवाएं देती रही।ये दौर भारत के इतिहास का स्वर्णिम दौर था जब हर किसी के हाथ मे भले ही अपना पर्सनल मोबाइल फोन नही था लेकिन पूरे परिवार और रिश्तेदारों को जोड़ने के लिए लैंडलाइन हुआ करते थे। 100 में से एक के पास बमुश्किल एक मोबाइल हुआ करता था वो भी ज़्यादातर काले रंग और आकार में बड़ा सा। इस दौर में एक मोबाइल फोन क्योंकि नया नया ही चला था तो लोगो मे खुद को रईस दिखाने और मोहल्ले में रौब झाड़ने की होड़ सी मची रहती इसके लिए एक मोबाइल सिम को लेने के लिए घण्टो लाइन में लगना पड़ता था। बीएसएनएल BSNL पूरे भारत मे सबसे ज्यादा प्रचलित था। बीएसएनएल के नेटवर्क भी बढ़िया थे बियावान जंगलों में भी बीएसएनएल के सिग्नल्स कैच करते थे। एक परिवार में एक मोबाइल फोन तो ज़रूरत बन गया,फिर धीरे धीरे परिवार के सदस्यों के मोबाइल फोन भी अलग अलग होने लगे। रिचार्ज वाउचर्स आने लगे,सस्ते दामों में ज़्यादा कालिंग टैरिफ मिलने लगा,हालांकि शुरुआत में इनकमिंग कॉल के भी पैसे लगते थे,लेकिन उपभोक्ताओं की ज़रूरत को देखते हुए इनकमिंग कॉल फ्री कर दी गयी।
लगभग एक दशक संचार की दुनिया मे बीएसएनएल ने ही राज किया। फिर धीरे धीरे प्राइवेट कम्पनियों की एंट्री हुई बीएसएनएल का स्वर्णिम दौर लदने लगा,मुनाफे में चलने वाली बीएसएनएल कंपनी घाटे में जाने लगी।वित्त वर्ष 2010-11 में बीएसएनएल को घाटे से गुजरना पड़ा,क्योंकि अब बाजार में संचार की दुनिया मे रिलायंस, वोडा,एयरटेल जैसे प्राइवेट खिलाड़ियों की एंटी हो गई। इन कम्पनियों ने ग्राहकों को लुभाने के लिए कालिंग वाउचर्स के साथ फ्री एसएमएस की सुविधा देनी शुरू कर दी। अब जमाना भी बदल गया था,फोन्स की जगह स्मार्टफोन्स ने लेनी शुरू कर दी थी,वहीं टेलीकॉम कंपनियों की पहुंच मोहल्लों से घर और घर से सदस्यों तक होने लगी थी।इस दौर में फोन पर इंटरनेट और कॉलिंग के लिए रेट टैरिफ का चलन शुरू हो चुका था।
मार्केट में एक दो नहीं बल्कि कई प्राइवेट टेलिकॉम कम्पनियां एक से बढ़कर एक प्लान्स के साथ आने लगे , कंज्यूमर्स के लिए कई बार रिचार्ज से ज्यादा सस्ता नया सिम लेना होने लगा, ऐसे में बीएसएनएल लगातार प्रतिद्वंदियों से पिछड़ने लगा।वित्त वर्ष 2009-10 से शुरू हुआ BSNL को हुए घाटे के बाद कंपनी ने अब तक प्रॉफिट का मुंह नहीं देखा।
एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2019-20 में कंपनी का घाटा 15,500 करोड़ पहुंच गया था। इसके बाद तो ऐसा लगने लगा कि कंपनी का बंद होना तय है. सरकार ने इसे एक बार फिर प्रॉफिटेबल बनाने की कोशिश करना शुरू कर दी है.

साल 2021 में कंपनी को 40 हजार करोड़ रुपये का राहत पैकेज मिला था. इसमें से आधी राशि शॉर्ट टर्म कर्ज को भरने में चली गई. साल 2022 में सरकार ने एक बार BSNL को राहत पैकेज दिया है।
सार्वजनिक क्षेत्री की टेलीकॉम कंपनी की ऐसी हालत की कई वजहों से हुई है. इसमें बड़ी भूमिका लालफीताशाही और धीरे-धीरे लिए गए फैसलों की है. साल 2021 से पहले कंपनी का ज्यादातर खर्च कर्मचारियों पर होता था.
लगभग 55 से 60 परसेंट कंपनी का एक्सपेंडेचर इसमें ही जाता था. साल 2016 में जियो के आने के बाद टेलीकॉम इंडस्ट्री में बहुत बड़ा बदलाव हुआ. 4G नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ और लोगों का फोकस इंटरनेट पर पहुंच गया.
जहां टेलीकॉम इंडस्ट्री में पहले रेट कटर और लो-कॉलिंग चार्ज वाले प्लान्स का बोलबाला था. वहां अब 4G डेटा और OTT बंडल्स आ गए। बीएसएनएल जो अब तक 4G सर्विस रोलआउट नहीं कर पाई है,अब इस दौड़ में दूर दूर तक दिखाई नही देती,जो बीएसएनएल के सिग्नल्स जंगलों में भी काम करते थे वो अब घनी आबादी में भी ठीक से काम नही करते।
बीएसएनएल के पिछड़े रहने के पीछे तीन प्रमुख वजह सरकारी दखल, लाल फीताशाही और स्पेक्ट्रम नीलामी में भाग नहीं लेना है। बीएसएनएल साल 2000 में आई थी, उस समय इसमें भारत सरकार की 100 फीसदी हिस्सेदारी थी। यानी बीएसएनएल पूरी तरह सरकार के कंट्रोल में थी बावजूद इसके समय पर जरूरी सरकारी मंजूरियां नहीं मिलने के चलते यह निजी ऑपरेटर्स से पिछड़ती चली गई। वहीं, साल 2006 से 2012 की अवधि में इस कंपनी में लाला फीताशाही काफी अधिक देखने को मिली। बीएसएनएल में टेंडर की प्रक्रिया पूरे होने में ही महीनों लग जाते थे। इस अवधि में कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में गिरावट आई और प्राइवेट प्लेयर काफी आगे निकल गए।साल 2010 में जब 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई, तो सरकारी कंपनी होने की वजह से बीएसएनएल ने इसमें हिस्सा नहीं लिया। साल 2016 में 4जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के समय भी बीएसएनएल को बाहर रखा गया।
आज जब दूसरी टेलीकॉम कंपनियां 4 G से आगे बढ़कर 5G स्पेक्ट्रम की रेस में शामिल हैं। वहीं बीएसएनएल BSNL सरकार की मंजूरी न मिल पाने की वजह से आज तक 4G की शुरुआत नहीं कर पाया।
वही रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रिलायंस जियो को 2016 में लॉन्च किया था। यह इस समय भारत में 43 करोड़ ग्राहकों के साथ 37% बाजार के हिस्से पर काबिज है। रेवेन्यू के मामले में इसका हिस्सा 39% है। रिलायंस जियो इंफोकॉम के नाम से रिलायंस इस टेलीकॉम कंपनी को चलाती है। जियो की शुरुआत 5 सितंबर 2016 को हुई थी और जियो वेलकम ऑफर से इसे लॉन्च किया गया था।अप्रैल 2011 तक देश में टेलीकॉम की कुल 15 कंपनियां थीं, जबकि अब केवल 5 कंपनियां हैं। इस दौरान कुछ छोटी कंपनियां बंद हो गईं, तो कुछ कंपनियां दूसरी कंपनियों में मिल गईं। हालांकि, एयरटेल ने इसका फायदा उठाया और उसने वीडियोकॉन, टाटा टेली, टाटा टेलीनॉर के ग्राहकों को खींच लिया और उनका स्पेक्ट्रम भी ले लिया। वोडाफोन इंडिया आइडिया सेल्युलर इसी दौरान एक में मिल गई।
15 कंपनियों में एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया, आरकॉम, टाटा टेली, एयरसेल, यूनिटेक, MTS, लूप, वीडियोकॉन, HFCL, S टेली, MTNL, BSNL और एटिसलाट थीं।
ICICI डायरेक्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि जियो का रेवेन्यू वित्त वर्ष 2023 में 96,199 करोड़ रुपए हो सकता है। यह 2021 के वित्तवर्ष में 69 हजार करोड़ रुपए था। इस हिसाब से 2024 के वित्तवर्ष तक कंपनी 1 लाख करोड़ रेवेन्यू हासिल कर सकती है।
दिग्गज टेलिकॉम कंपनी भारती एयरटेल के शेयर में अगस्त 2022 में 2 फीसदी की तेजी दर्ज की गई. चालू वित्त वर्ष 2022-23 की अप्रैल-जून तिमाही में टेलिकॉम कंपनी के नतीजे मिलेजुले रहे,आय में बढ़त बनी रही, मुनाफा भी पांच गुना बढ़कर आया। ARPU 178 रुपये से बढ़कर 183 रुपये रहा। मार्जिन में हल्की फुल्की गिरावट रही,जून तिमाही के नतीजे के बाद ब्रोकरेज हाउस ने खरीदारी की सलाह दी, अब दिसम्बर तक शेयर में 35 फीसदी से ज़्यादा रिटर्न मिल सकने की संभावना है।
गौरतलब है कि भारत संचार निगम लिमिटेड के कुल कर्जा लगभग 15000 करोड़ का है और रिलाएंस जिओ का एक वर्ष का प्रॉफिट 4000 करोड़ से कही ज्यादा है। अगर मोदी सरकार भली मंशा से काम करें तो बीएसएनएल का कर्ज एक ही वर्ष में खत्म हो जाये और एक ही वर्ष में बीएसएनएल फायदे में आ जाये लेकिन अगर ऐसा होता है तो सरकारी खजाने में वृद्धि होती जो शायद सरकार को गंवारा नही है । चूंकि अडानी और अम्बानी जैसे बड़े घरानों की आय बढ़ने से नेताओं का भी कहीं न कहीं हित छुपा होता है, जिस वजह से सरकारी नवरत्न कंपनियों को धीरे धीरे समाप्त किया जा रहा है और निजी खिलाड़ी दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहे है । भारत की सभी राजनैतिक पार्टियां कहीं न कहीं इसी चंदे से चलती है और ये बात जनता को पता न चल जाये इसलिए राजनैतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार अधिनियम में नही लाया गया है ।
एक तरह से निजी खिलाड़ियों को फायदा पहुंचाते हमारे कठपुतली की तरह काम करते नेता है, दूसरी तरफ इन नेताओं के चाटुकार है जिनको निजी कंपनियों के विकास में भारत का विकास नजर आ जाता है ।
शायद आपको याद हो कुछ साल पहले भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सभी राष्ट्रीय समाचार पत्रों में 4 जी की लॉन्चिंग पर विज्ञापन आया था जिसमें नरेंद्र मोदी जिओ 4 जी का विज्ञापन करते नजर आ रहे थे,जिससे पता चलता है कि भारत के प्रधानमंत्री निजी खिलाड़ियों के लिए कितना समर्पित है ।
अभी साल को खत्म होने में तीन माह है और 4G सर्विस रोलआउट इस साल के अंत तक ही होना था, लेकिन हाल में आई एक रिपोर्ट में यह समय और बढ़ा दिया गया है,रिपोर्ट की मानें तो अगर सरकार की दखल,लाल फीताशाही ने दबाव न बनाया तो बीएसएनएल BSNL 4G लांच करने में अभी भी 18 से 24 महीने का समय ले सकता है।