Big Breaking: पायजामे का नाड़ा तोड़ना, ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं...! सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, लगाई फटकार

Big Breaking: Tearing the string of your pyjama or grabbing your breast is not rape! The Supreme Court overturned the Allahabad High Court's decision and reprimanded it.

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि एक बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है। बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले पर पहले भी खूब हंगामा हुआ था। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार भी लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पायजामे का नाड़ा खोलना बलात्कार की कोशिश है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एनवी अंजारिया के साथ कहा कि यौन अपराधों के मामलों में फैसले के लिए कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की जरूरत होती है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना रेप की कोशिश के बराबर है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित आदेश को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि ये सिर्फ रेप करने की तैयारी है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एन वी अंजारिया की बेंच ने कहा कि विवादित ऑर्डर को क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के तय सिद्धांतों के साफ तौर पर गलत इस्तेमाल की वजह से रद्द किया जाता है। कोर्ट ने 10 फरवरी को यह ऑर्डर एक सुओ मोटो याचिका पर दिया था, जिसमें उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऑर्डर का संज्ञान लिया था, इसमें कहा गया था कि सिर्फ ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का डोरा खींचना रेप का अपराध नहीं है। हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट के तहत दो आरोपियों के खिलाफ रेप की कोशिश के असली कड़े चार्ज को बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जो फैक्ट्स बताए गए हैं, उन्हें देखते हुए, हम हाईकोर्ट के इस नतीजे से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप सिर्फ रेप के अपराध को करने की तैयारी के हैं। आरोपियों द्वारा की गई कोशिश साफ तौर पर और जरूरी तौर पर हमें इस नतीजे पर ले जाती है कि पहली नज़र में, शिकायत करने वाले और प्रॉसिक्यूशन ने रेप करने की कोशिश के प्रोविज़न को लागू करने का मामला बनाया है। इसलिए क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के तय सिद्धांतों के साफ़ तौर पर गलत इस्तेमाल के कारण, विवादित फैसले को रद्द किया जाता है।

जरा सा भी शक नहीं रह जाता...
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों को सिर्फ़ देखने से इस बात में ज़रा सा भी शक नहीं रह जाता कि आरोपी इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 376 (रेप) के तहत अपराध करने के पहले से तय इरादे से आगे बढ़े। अदालत ने कहा कि 17 मार्च 2025 का विवादित फैसला रद्द किया जाता है और स्पेशल जज पॉक्सो कासगंज का 23 जून 2023 का ओरिजिनल समन ऑर्डर फिर से लागू किया जाता है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस कोर्ट ने इस फैसले के जरिए जो बातें कही हैं, वे शिकायत करने वाले के सिर्फ पहली नजर में हैं, और उन्हें आरोपियों के गुनाह पर कोई राय नहीं माना जाएगा, जो चल रहे ट्रायल का विषय है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
17 मार्च, 2025 के अपने ऑर्डर में, हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि सिर्फ़ ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का डोरा खींचना रेप का जुर्म नहीं है, लेकिन यह किसी महिला के कपड़े उतारने या उसे नंगा होने के लिए मजबूर करने के इरादे से हमला या क्रिमिनल फोर्स के इस्तेमाल के दायरे में आता है। यह ऑर्डर जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने दो लोगों की रिवीजन पिटीशन पर पास किया था, जिन्होंने कोर्ट में कासगंज के एक स्पेशल जज के ऑर्डर को चैलेंज किया था, जिसके तहत कोर्ट ने उन्हें दूसरी धाराओं के अलावा आईपीसी की सेक्शन 376 के तहत समन भेजा था।