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बागेश्वर: नौ साल से पुल का इंतजार! जंग लगे तारों की अस्थायी गरारी बनी ग्रामीणों की मजबूरी, रामगंगा नदी पार कर स्कूल जाते हैं बच्चे

Author:Awaaz Desk
🕒 Last Updated:2026-09-02 15:22:37
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बागेश्वर और पिथौरागढ़ की सीमा पर बसे गांवों के ग्रामीण पिछले कई वर्षों से एक अदद पुल के इंतजार में हैं। वर्ष 2018 की आपदा में रामगंगा नदी पर बना झूला पुल बह गया था, लेकिन करीब नौ साल बीतने के बाद भी इसका स्थायी निर्माण नहीं हो सका है।
बागेश्वर: नौ साल से पुल का इंतजार! जंग लगे तारों की अस्थायी गरारी बनी ग्रामीणों की मजबूरी, रामगंगा नदी पार कर स्कूल जाते हैं बच्चे

बागेश्वर: नौ साल से पुल का इंतजार! जंग लगे तारों की अस्थायी गरारी बनी ग्रामीणों की मजबूरी, रामगंगा नदी पार कर स्कूल जाते हैं बच्चे (सांकेतिक तस्वीर)

⚡ख़बरें फटाफट (संक्षेप में)

⏱️ 30-Sec Glance
  • बागेश्वर और पिथौरागढ़ की सीमा पर बसे गांवों के ग्रामीण पिछले कई वर्षों से एक अदद पुल के इंतजार में हैं।
  • वर्ष 2018 की आपदा में रामगंगा नदी पर बना झूला पुल बह गया था, लेकिन करीब नौ साल बीतने के बाद भी इसका स्थायी निर्माण नहीं हो सका है।
  • पुल नहीं होने के कारण भकोना, खेती, कालापैर कापड़ी समेत आसपास के कई गांवों के ग्रामीण जंग लगे लोहे के तारों से बनी अस्थायी गरारी के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं।
  • ग्रामीणों के लिए यह गरारी अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।

बागेश्वर। बागेश्वर और पिथौरागढ़ की सीमा पर बसे गांवों के ग्रामीण पिछले कई वर्षों से एक अदद पुल के इंतजार में हैं। वर्ष 2018 की आपदा में रामगंगा नदी पर बना झूला पुल बह गया था, लेकिन करीब नौ साल बीतने के बाद भी इसका स्थायी निर्माण नहीं हो सका है। पुल नहीं होने के कारण भकोना, खेती, कालापैर कापड़ी समेत आसपास के कई गांवों के ग्रामीण जंग लगे लोहे के तारों से बनी अस्थायी गरारी के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों के लिए यह गरारी अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। इसी अस्थायी व्यवस्था के सहारे ग्रामीण जरूरी सामान लेने, कामकाज और अन्य आवश्यक गतिविधियों के लिए नदी के दूसरी ओर आवागमन करते हैं। सबसे बड़ी चिंता स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर है, जिन्हें पढ़ाई के लिए इसी जोखिम भरे रास्ते से आवागमन करना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के मौसम में रामगंगा नदी का जलस्तर और बहाव बढ़ जाता है। ऐसे समय में नदी पार करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। जंग लगे लोहे के तारों से बनी गरारी के लंबे समय से इस्तेमाल के कारण इसकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे मजबूरी में इस अस्थायी साधन का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास सुरक्षित आवागमन का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पूर्व विधायक ललित फर्शवाण ने भी इस समस्या को गंभीर बताते हुए सरकार और संबंधित विभाग से जल्द से जल्द पुल निर्माण की मांग की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 की आपदा में बहा झूला पुल आज तक नहीं बन पाया है। इससे भकोना, खेती, कालापैर कापड़ी और आसपास के गांवों के लोगों को लंबे समय से परेशानी उठानी पड़ रही है। पूर्व विधायक ने कहा कि क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों को सुरक्षित और स्थायी आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए पुल का निर्माण जल्द कराया जाना चाहिए। ग्रामीणों को उम्मीद है कि वर्षों पुरानी उनकी मांग पर अब गंभीरता से कार्रवाई होगी और अस्थायी गरारी के सहारे नदी पार करने की मजबूरी से उन्हें जल्द निजात मिलेगी।

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