उत्तराखंड विशेष : वन्यजीवों के संरक्षण के लिए जब जिम कॉर्बेट ने शुरू किया ऐसा शिकार जो फेमस हुआ "हंटिंग विद द कैमरा" के नाम से
विश्व इतिहास में जिम कॉर्बेट का नाम एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में दर्ज है, जिन्होंने एक ओर आदमखोर बाघों और तेंदुओं से हजारों लोगों की जान बचाई, तो दूसरी ओर वन्यजीव संरक्षण की ऐसी अलख जगाई, जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति नई सोच दी। बहुत कम लोग जानते हैं कि जितने कुशल वे शिकारी थे, उतने ही प्रभावशाली लेखक भी थे। उनकी चर्चित रचनाओं में "ब्रदर इंडिया (Brother India)" और जंगलों पर आधारित अन्य पुस्तकें आज भी प्रकृति और वन्यजीवन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं।

25 जुलाई 1875 को नैनीताल में जन्मे जेम्स एडवर्ड "जिम" कॉर्बेट ब्रिटिश भारतीय सेना में कर्नल रहे। उत्तराखंड का विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क आज भी उनके नाम और योगदान की जीवंत पहचान है। इस पार्क की स्थापना 8 अगस्त 1936 को हेली नेशनल पार्क के रूप में हुई थी। बाद में वन्यजीव संरक्षण में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए इसका नाम बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रखा गया। यह भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान भी है।
आदमखोरों के आतंक से लोगों को दिलाई राहत
सन् 1907 से 1938 के बीच कुमाऊं और गढ़वाल के अनेक इलाकों में आदमखोर बाघों और तेंदुओं का आतंक चरम पर था। ग्रामीण भय के साये में जीवन जी रहे थे। ऐसे समय में जिम कॉर्बेट ने अपनी जान जोखिम में डालकर इन आदमखोरों का सामना किया। उन्होंने कई नरभक्षी बाघों और तेंदुओं का शिकार किया, जिनमें चंपावत की आदमखोर बाघिन भी शामिल थी, जिसे लगभग 436 लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है। यह शिकार विश्व इतिहास के सबसे चर्चित वन्यजीव अभियानों में गिना जाता है।

इसी तरह भारत-नेपाल सीमा पर सक्रिय एक अन्य आदमखोर बाघिन, जिसने दो सौ से अधिक ग्रामीणों की जान ले ली थी, उसका भी शिकार जिम कॉर्बेट ने किया। कहा जाता है कि उस समय सरकार ने उस बाघिन को मारने पर इनाम घोषित किया था, लेकिन जिम कॉर्बेट ने शिकार से पहले दो शर्तें रखीं। पहली, घोषित इनाम हटाया जाए और दूसरी, जंगल में मौजूद सभी अन्य शिकारियों को वापस बुलाया जाए। सरकार के सहमत होने के बाद ही उन्होंने अभियान शुरू किया।
बाघिन को मारने के बाद उन्होंने केवल अपनी सफलता का जश्न नहीं मनाया, बल्कि यह जानने का प्रयास किया कि वह आदमखोर क्यों बनी। जांच में पता चला कि वर्षों पहले किसी शिकारी की गोली उसके जबड़े में लगी थी, जिससे उसके दांत और जबड़ा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। वह सामान्य शिकार नहीं कर पा रही थी और मजबूरी में इंसानों पर हमला करने लगी। इस घटना ने जिम कॉर्बेट की सोच बदल दी और वे वन्यजीव संरक्षण के सबसे बड़े समर्थकों में शामिल हो गए।
शिकारी से वन्यजीव संरक्षक बनने की कहानी
जिम कॉर्बेट का मानना था कि अधिकांश बाघ और तेंदुए जन्म से आदमखोर नहीं होते, बल्कि किसी चोट, बीमारी या मानवीय हस्तक्षेप के कारण वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं। यही कारण था कि जब बाघों की संख्या घटने लगी तो उन्होंने बंदूक छोड़ कैमरा उठा लिया।
उन्होंने वन्यजीव फोटोग्राफी को नया आयाम देते हुए इसे "Hunting with the Camera" का नाम दिया। इसके बाद उन्होंने जंगल, वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें जंगल के प्रति उनकी गहरी समझ स्पष्ट दिखाई देती है।
उनकी जंगल संबंधी जानकारी अद्भुत थी। वे अक्सर ऐसे पेड़ों के नीचे रात बिताते थे, जहां लंगूर रहते थे, क्योंकि उनका मानना था कि यदि कोई बाघ या तेंदुआ आसपास आएगा तो सबसे पहले लंगूर शोर मचाकर खतरे की सूचना देंगे। कई बार वे गाय-भैंसों के बाड़ों या घोड़ों के तबेलों के पास भी विश्राम करते थे, क्योंकि ये पशु भी शिकारी जानवरों की आहट जल्दी पहचान लेते हैं।
बहन मैगी से था अटूट स्नेह
जिम कॉर्बेट के जीवन का एक अत्यंत भावनात्मक पक्ष उनकी बहन मैगी (Margaret "Maggie" Corbett) से जुड़ा है। दोनों भाई-बहन के बीच असाधारण स्नेह था। कहा जाता है कि दोनों ने एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए आजीवन विवाह नहीं किया और पूरी जिंदगी एक-दूसरे के सहारे रहे।

भारत छोड़ने के बाद दोनों केन्या के न्येरी (Nyeri) में बस गए। 19 अप्रैल 1955 को जिम कॉर्बेट का निधन केन्या में हुआ। बाद में उनकी बहन मैगी का भी वहीं निधन हुआ और आज सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च कब्रिस्तान, न्येरी (St. Peter's Anglican Church Cemetery, Nyeri, Kenya) में दोनों भाई-बहन की कब्रें साथ-साथ मौजूद हैं। यह उनके आजीवन साथ और गहरे पारिवारिक प्रेम का प्रतीक मानी जाती हैं।

कालाढूंगी आज भी संजोए है उनकी यादें
जिम कॉर्बेट ने नैनीताल के निकट कालाढूंगी में अपना घर बनाया था। आज यह भवन संग्रहालय के रूप में संरक्षित है और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है। यहां उनकी निजी वस्तुएं, तस्वीरें और जीवन से जुड़ी अनेक यादें सुरक्षित रखी गई हैं।
वे केवल शिकारी या लेखक ही नहीं थे, बल्कि उत्कृष्ट फोटोग्राफर, बढ़ई, चमड़े के काम में दक्ष और प्रकृति के गहरे अध्येता भी थे। उनके व्यक्तित्व के इतने आयाम थे कि उन पर अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं।
शेर सिंह को सौंप गए अपनी बंदूक
केन्या जाने से पहले जिम कॉर्बेट अपनी प्रिय बंदूक कालाढूंगी निवासी शेर सिंह को सौंप गए थे। स्थानीय लोगों के अनुसार वह ऐतिहासिक बंदूक आज भी शेर सिंह के परिवार के पास सुरक्षित है। परिवार उसे केवल एक हथियार नहीं, बल्कि जिम कॉर्बेट की अमूल्य धरोहर मानता है।
आज, उनके जन्मदिवस पर जिम कॉर्बेट को केवल एक महान शिकारी के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने यह सिखाया कि जंगल और वन्यजीव मनुष्य के शत्रु नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का आधार हैं। उनका जीवन साहस, संवेदनशीलता, पर्यावरण संरक्षण और मानवता के प्रति समर्पण की ऐसी मिसाल है, जो आज भी पूरी दुनिया को प्रेरित करती है।